मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

कसूरवार

डॉ प्रदीप उपाध्याय

अब वह जीना चाहता है।वह पंछियों को दूर गगन में उड़ते हुए देखना चाहता है।रंग-बिरंगी तितलियों का इस फूल से उस फूल तक उड़ना,चिड़ियों का चहचहाना, पक्षियों का कलरव, नदी,पहाड़, जंगल इन सबसे गुजरना चाहता था।अब ये सभी उसे फिर अच्छे लगने लगे थे।उसे याद है कि आठ साल पहले जब कैंसर डिटेक्ट हुआ था तब बहुत निराशा के गर्त में चला गया था किन्तु परिवार के सपोर्ट से छ:महीने में ही उसपर विजय पा ली थी।टाटा मेमोरियल में ही ऑपरेशन हुआ था।तब डॉक्टरों ने कह दिया था कि गुटखा-तम्बाकू को अब हाथ भी मत लगाना।उसे याद है कि दो साल तक उसने इनसे बराबर दूरी बनाकर रखी।उसकी बीमारी के कारण निराशा के भंवर में उतर चुकी पत्नी सुलेखा भी तब प्रसन्न रहने लगी थी।कितनी सौम्य और सुन्दर पत्नी मिली थी और फिर दो नन्हे-प्यारे बच्चे भी तो ईश्वर के वरदान के रूप में मिल गए थे।इकलौती संतान होने से माता-पिता का भी कितना लाड़-दुलार मिल रहा था।किन्तु आह!वह यह क्या कर बैठा!उसने जब फिर से तम्बाकू-गुटखा खाना शुरु कर दिया था तो सभी ने समझाया था, मना किया लेकिन वह नहीं माना।अब गलती तो हो ही गई।फिर कैंसर ने उसे चपेटे में ले लिया और डॉक्टर बोल भी चुके हैं कि वह ज्यादा दिन का मेहमान नहीं है।पत्नी कहती है कि वह दोषी है जिसने नशे की लत पर समय रहते रोक नहीं लगाई।माता-पिता स्वयं को कसूरवार ठहरा रहे हैं लेकिन वह किसे दोष दे।क्या ईश्वर को, जो उसे जीने के लिए एक मौका और नहीं दे रहा है या फिर वह स्वयं कसूरवार है अपने बीवी-बच्चों और माता-पिता का जिनके बारे में उसने नहीं सोचा।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें