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वर्ष: 1, अंक 4,  अक्टूबर, 2016


विपक्ष का जोश


तारकेश्वर कुमार ओझा


मोरली हाइ या डाउन होने का मतलब तब अपनी समझ में बिल्कुल नहीं आता था। क्योंकि जीवन की जद्दोजहद के चलते अब तक अपना मोरल हमेशा डाउन ही रहा है । लेकिन खासियत यह कि जेब में फूटी कौड़ी नहीं वाले दौर में भी यह दुनिया तब  बड़ी खूबसूरत लगती थी। जी भर के जीने का मन करता था। इसके बावजूद शुरूआती दौर में जिंदगी इतनी ठहरी हुई होती थी कि मोहल्ले में यदि किसी के यहां पूजा - पाठ को लेकर लाउडस्पीकर लगता तो अपना मन खुशियों से बल्लियों उछलने लगता कि चलो कुछ तो हलचल हुई जिंदगी में...।  वैसे उस दौर में किसी आयोजन में लाउडस्पीकर बजवाना खुशी की अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम था। किसी के यहां चोंगा - लाउडस्पीकर लगते ही कयासबाजी शुरू हो जाती ... अरे क्या बात है। शादी हो रही है या अन्न प्रसान... या फिर कोई लाटरी लग गई है। 

हम जैसे लड़कों का मन तो  फिल्मी गाने सुनने को होता, लेकिन बड़ों की सीख रहती कि चूंकि मौका शुभ कार्य का है। पूजा होनी है तो पहले भक्ति गीत या भजन सुने जाएं। 

फिर शुरू हो जाता दर्शन शास्त्र के अवसाद भरे गीतों का दौर... दो दिन का जग में मेला फिर चला - चली का बेला..। 

ऐसे गीत सुन कर हमें बड़ा गुस्सा आता कि कहां तो अपना युवा मन... उड़ता ही फिरूं ... इन हवाओं में कहीं... गाने को बेताब है और कहां इस तरह की नकारात्मक बातें की जा रही है। 

दूसरों की शादी हमें असीम खुशी देती। 

हमें यही लगता ... शादी तो हमेशा दूसरों की होनी है। अपना काम तो बस शादी को इंज्वाय करते हुए खाना - पीना और मस्ती करना है। 

लेकिन जल्दी ही आटे - दाल का भाव मालूम हो गया। 

आप सोचेंगे अतीत की इन बातों की भला वर्तमान में क्या प्रासंगिकता है जो इतनी चर्चा हो रही है। 

दरअसल अपने देश में  विरोधी पा र्टियां और शासक दल के बीच अनवरत चलने वाला जोश और होश का खेल इन बातों की बरबस ही याद करा देता है। 

जो  पार्टियां विपक्ष में रहते हुए जोश में दिखाई देती हैं , सत्ता की बागडोर मिलते  ही उनका सारा जोश गायब सा नजर आने लगता है और वे होश में दिखाई देने लगते हैं।

शासन संभालते ही शासक दल की आंखों का चश्मा मानो बदल जाता है। पहले जो आंखे कश्मीर , आतंकवाद , महंगाई और अन्यान्य समस्याओं को दूसरी नजर से देखती थे। आंखों पर सत्ता का चश्मा चढ़ते ही उनकी दृष्टि अचानक बदल जाती है। 

देश में यह सिलसिला मैं बचपन से देखता आ रहा हूं। बीच - बीच में पाला - बदल होता रहता है। लेकिन तस्वीर लगभग वही रहती है। 

विपक्षी खेमे में रहते जो शेर बने घूमते थे, सत्ता मिलते ही उनके सुर बदल जाते हैं। 

झल्लाहट में कभी - कभी तो  तो यहां तक कह दिया  जाता है कि ... मेरे पास महंगाई कम करने की कोई जादूई छड़ी नहीं वगैरह - वगैरह। 

लेकिन कालचक्र में फिर विपक्ष में जाते ही इस खेमे के पास हर समस्या का फौरी हल विशेषज्ञों की तरह मौजूद रहता है।

 यानी यहां भी  जोश और होश का फैक्टर हमेशा  हावी रहता है। 

जब - तक विपक्ष में रहे बताते रहे कि देश की इन विकट समस्याओं का समाधान क्या है। समस्याओं पर जिनके व्याख्यान सुन - सुन मन बेचैन होने लगता है कि बेचारे को सत्ता की कुर्सी पर बिठाने में आखिर इतनी देरी क्यों हो रही है। 
लेकिन  समाधान के बजाय सत्ता मिलते ही उनकी ओर से  वही किंतु - परंतु के साथ दलीलें सुनने को मिलती हैं। 

यानी उड़ता ही फिरूं ... इन हवाओं में कहीं ... गाने को बेचैन रहने वाला विरोधी मन सत्ता मिलते ही अचानक  दो दिन का जग में मेला सब....  चला - चली का बेला ....  गुनगुनाते हुए न सिर्फ स्वयं  अवसाद में डूब जाता है बल्कि जनता - जनार्दन को भी मायूस करता है।


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