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वर्ष: 1, अंक 4,  अक्टूबर, 2016


खेतों से शरीरमें जाता जहर - कृषि रसायनों से दूषित होता पर्यावरण एवं स्वास्थ्य


सुशील शर्मा


 

एक समय था जब घर में भोजन बनते ही सारा घर महक उठता था। मेरी माँ आँगन में बिर्रा (गेहूं एवं चना के मिश्रण )की रोटियां एवं आलू प्याज की तली सब्जी बनाती थी एवं हम दोनों भाई चटखारे ले कर कहते थे। वह स्वाद आज भी मुँह में पानी भर देता है। आज भी माँ रोटी बनाती है वही स्नेह है लेकिन स्वाद में बहुत अंतर आ गया है। क्या कारण  है कि धीरे धीरे अनाज एवं सब्जियों में से वह न भुलाने वाला स्वाद लुप्त होता जा रहा है। सब्जियों एवं खाद्यान्नों की ऊर्जा का ह्राष हो रहा है। कृषि रसायनों ने हमारी मिट्टी पानी हवा और सम्पूर्ण पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है। सबसे गंभीर प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर हुए हैं। यही जहरीले रसायन फलों सब्जियों अनाजों दालों मसालों खाद्य तेलों दूध अंडे मांस पानी आदि के साथ आपके शरीर में प्रवेश कर आपकी सेहत को तबाह करते हैं। सब्जियों के खेत की सिचाई प्रदूषित जल से की जाती है जिसमे अनेकों जहरीले पदार्थ पौधों द्वारा अवशोषित होते है जहरीले रसायनों से भरी है।

 

आमतौर पर यह माना जाता है कि ज्यादा मात्रा में रासायनिक खाद एवं कीटनाशक इस्तेमाल करने से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और उत्पादन बढ़ने से किसान का मुनाफा बढ़ सकता है। सरकार भी किसानों को वैज्ञानिक ढंग से खेती करने की सलाह देती है, लेकिन इस वैज्ञानिक विधि का अर्थ सिर्फ और सिर्फ रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल तक ही सीमित होता है। अमेरिका में हुए अनुसन्धान के परिणामों से ज्ञात होता है कि जब कीटनाशी रसायनों का पेड़-पौधों, सब्जियों और फलों पर छिड़काव किया जाता है तो इन रसायनों का 1 % मात्रा ही सही लक्ष्य तक प्रभावी हो पाती है , शेष 99 % रसायन पर्यावरण को प्रदूषित करता है।देश में फसलों पर हर वर्ष 25 लाख टन पेस्टीसाइड का प्रयोग होता है। इस प्रकार हर वर्ष10 हजार करोड़ रुपए खेती में इस्तेमाल होने वाले पेस्टीसाइडों पर खर्च हो जाते हैं। आज खतरा केवल रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग से ही नहीं है बल्कि खाद्य पदार्थों मे जिस तरह मिलावट का धंधाफल-फूल रहा है वह मानवीय स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बन गया है।

सब्जियाँ जहरीले रसायनों से भरी है हम रोजाना ०.५ मि.ली.ग्राम जहर ले रहे है परवल को रंगा जा रहा है सब्जी के आकार को जल्दी बडा करने के लिए उसमे आक्सीटानिक्स का इंजेक्शन लगाया जाता है यह प्रयोग बेल वाली सब्जी पर सबसे ज्यादा किया जाता है इससे सब्जियों की लम्बाई चौड़ाई जल्दी बढ़ जताई है और किसान ज्यादा मुनाफा कमाते है बासी सब्जियों को मैलाथियान के घोल में १० मिनट तक डाला जाता है ताकि सब्जी २४ घंटे तक ताजा रहे इसका प्रयोग भिन्डी गोभी मिर्च परवल लौकी पत्ता गोभी पर किया जाता है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल से अनाज सब्जियां दूध और पानी जो इंसान के जीवन का प्रमुख आधार हैं जहरीले बनते जा रहे हैं। इस वजह से इंसानी जीवन धीरे-धीरे खतरे में पड़ता जा रहा है।

आज हार्टअटैक शुगर ब्लडप्रेशर एवं अन्य कई प्रकार की बीमारियां आम होती जा रही हैं। आज हम जो भी खाते हैं उसमें रासायनिक तत्वों की अधिकता इतनी ज्यादा होती है कि हमारा खाना मीठा जहर बन चुका है।

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर के वैज्ञानिकों के अनुसार गेहूँ की फसल में उर्वरकों का प्रयोग बढ़ने से रोटी में भी उर्वरक अवशेष बढ़ते जा रहे हैं। विश्व बैंक द्वारा किये गए अध्यन के अनुसार दुनिया में 25 लाख लोग प्रतिवर्ष कीटनाशकों के दुष्प्रभावों  के शिकार होते है, उसमे से 5 लाख लोग तक़रीबन काल के गाल में समा जाते है । लम्बे समय तक ऐसे गेहूँ के प्रयोग से हार्ट तथा लिवर से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं या लकवा भी हो सकता है।कृषि रसायन शरीर में रक्त के साथ बह रहे हैं पंजाब के भटिंडा और मुक्तसर जिलों के ग्रामीणों के रक्त के नमूनों की जांच करने पर सबसे खराब नमूनों में 13 तरह के कीटनाशक पाए गए।

 

गन्ने की सघन खेती वाले क्षेत्रों में लड़कियों में 7 वर्ष की उम्र में ही माहवारी शुरू  हो गई। पक्षियों के अंडों के छिलके इतने पतले हो गए कि वे असानी से फूट जाते थे। डी.डी.टी. से सेक्स में परिवर्तन के लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं। यानि कि, ये रसायन हमारी अनुवांशिकता के वाहक क्रोमोजोम्स पर स्थित जीन्स की संरचना में भी अवांछित परिवर्तन करने में सक्षम हैं।रासायनिक खाद कीटनाशी फफूंदनाशी खरपतवारनाशी रसायनों के उपयोग के दौरान संपर्क में आने पर वे किसानों के आंख, नाक, त्वचा और होठों की कोशिकाओं के मार्फत शरीर में प्रवेश कर रक्त के साथ वीर्य में पहुँचकर उसकी पी.एच. कम करके उसे अम्लीय बना देते हैं तथा प्रति एम.एल. वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या 7.5 करोड़ से घटकर 4.4 करोड़ रह जाती है। क्षतिग्रस्त शुक्राणुओं की संख्या भी बढ़ जाती है। इन सब बातों से उनकी प्रजनन क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

 

कृषि रसायनों का भरपूर प्रयोग करने वाले फार्मों में तथा उनके समीप रहने वाले बच्चों का आई.क्यू. लेवल फार्म से दूर रहने वाले बच्चों की तुलना में काफी नीचा है। वृध्दों के भूलने की बीमारी अलजाइमर्स का संबंध भी कृषि रसायनों से जुड़ा पाया गया है। यानि ये रसायन मनुष्य की मानसिक क्षमता को भी कम कर रहे हैं।

 

हमे अपनी सुरक्षा स्वयं करनी होगी |खेत में जैव-विविधता होनी चाहिये यानी कि केवल एक किस्म की फसल न बो कर खेत में एक ही समय पर कई किस्म की फसल बोनी चाहियें। जैव-विवधता या मिश्रित खेती मिट्टी की उत्पादकता बढ़ाने और कीटों का नियन्त्रण करने, दोनों में सहायक सिद्ध होती है। जहाँ तक सम्भव हो सके हर खेत में फली वाली या दलहनी (दो दाने वाली) एवं कपास, गेहूँ या चावल जैसी एक दाने वाली फसलों को मिला कर बोएँ। दलहनी या फली वाली फसलें नाइट्रोजन की पूर्ति में सहायक होती हैं। एक ही फसल यानी कि कपास इत्यादि की भी एक ही किस्म को न बो कर भिन्न-भिन्न किस्मों का प्रयोग करना चाहिए। फसल-चक्र में भी समय-समय पर बदलाव करना चाहिये। एक ही तरह की फसल बार-बार लेने से मिट्टी से कुछ तत्व  खत्म हो जाते हैं एवं कुछ विशेष कीटों और खरपतवारों को लगातार पनपने का मौका मिलता है। कीटनाशकों का प्रयोग करके हम पौधा खाने वाले कीड़े के साथ साथ उन कीड़ों को नष्ट कर रहे हैं, जो हानिकारक कीड़ों को खाते हैं. इस तरह हम समस्या के साथ साथ समाधान का भी उन्मूलन कर रहे थे और कीड़ों में उन कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो रही थी, इसके अलावा लाखों रूपये कीटनाशकों पर व्यय हो रहे थे जो किसानो को लाभ के रूप में प्राप्त हो सकते थे।

 

            हम सुबह से लेकर रात के भोजन तक जो भी हम अपने शरीर में ग्रहण करते हैं, उसका महत्व हमारे अस्तित्व से जुड़ा है। परेशान किसान अब रासायनिक खाद व कीटनाशकों के चक्रव्यूह से निकलना चाहता है ताकि भूमि को फिर से उर्वरक बनाया जा सके।जब तक हम प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण दोहन पर विराम नहीं लगायेंगे, पर्यावरण संरक्षण व संवर्द्धन की बात निरर्थक होगी ।  हमें किसानों को हर संभव सहायता देनी होगी, जिससे कि वे अपने आपको मंहगी कृषि पद्धतियों तथा कीटनाशकों के चक्र से मुक्त कर सतत पोषनीय तथा स्वस्थ कृषि में संलग्न हो सकें। धरती में इतनी क्षमता है कि वह सब की जरूरतों को पूरा कर सकती है, लेकिन किसी के लालच को पूरा करने में वह सक्षम नहीं है।


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