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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



खानदानी पियक्कड़

सुभाष चन्द्र


 

सुबह आठ बजे का समय था जब विनय ने राकेश को बताया कि रात पंजाबी बाग़ में विमल की शादी के रिसेप्शन से लौटते वक़्त पुनीत की कार सफ़दरजंग अस्पताल के पास किसी तेज रफ़्तार ट्रक से टकराई और पुनीत......। आगे के शब्द सुनकर वह स्तब्ध रह गया। वह आर के पुरम के अपने सरकारी फ्लैट से तेजी से बाहर आते वक़्त अपनी पत्नी विभा से बोला, " मुझे लौटने में देर हो सकती है। तुम बच्चों को तैयार कर स्कूल भेज देना। और हाँ, मैं तुम्हें कुछ देर बाद फोन भी करूंगा। "
यही कोई बीस मिनट बाद वह लाजपत नगर में पुनीत के घर में दाखिल हो रहा था।घर में मातम पसरा हुआ था। करीबी लोग बाहर आँगन में बिछी दरी पर बैठे हुए थे और भीतर कमरे में पुनीत का कफ़न से ढका शव बाहर से ही नज़र आ रहा था। उसने आँखों में आई नमी को नियंत्रित किया और वह पुनीत के सत्तर वर्षीय पिता हरबंस लाल जी के पास जाकर बैठ गया। कुछ लोग शव यात्रा से जुड़े प्रबंध में जुटे थे तो कुछ रात हुई उस मनहूस दुर्घटना पर हल्की आवाज में चर्चा कर रहे थे। राकेश को रात रिसेप्शन में पुनीत से हुई बातें परेशान कर रहीं थी।
दरअसल, विमल के बड़े भैय्या ने अपने यार दोस्तों के लिए पीने - पिलाने का इंतजाम किया हुआ था। खैर, जब पुनीत चौथा पेग पी रहा था तो राकेश ने उसे रोकने की कोशिश की थी । पुनीत तब नाराजगी भरे स्वर में बोला था , " यार, मुझे एक दो पटियाला पेग और पीने दो। तुम नाहक चिंता कर रहे हो। शराब तो हमारे खून में रची - बसी हुई है। आखिर, हम खानदानी पियक्कड़ जो ठहरे। "


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