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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



अंदर बाहर मेरे

समितंजय शुक्ला


विचारों की शांत बहती धाराओं में... अचानक उठे बुलबुले बने भवर, छलके घाट दबा ले जाते हैं अन्दर खींच अनंत अन्धकार बेतल गहराई में अचानक मुझे, ऐसे ही कभी कभी अनजाने काल! “बचाओ... कि मैं ख़तम हो रहा हूँ मिट रहा अस्तित्व , हर क्षण मर रहा हूँ .. धीरे-धीरे, कमज़ोर पड़ रहा हूँ बहोत मिला रहे हो मिटटी में मुझे, एक तुम्ही हो, जो बचा सकते हो मुझे, गैरों में .. उठो बचाओ मुझे अपने आप से ! बचाओ..!” उठ बैठता हूँ मैं घबरा चीखता कोई भर्राई डरी, डराती आवाज़ में मेरे कमरे में अकस्मात, हरदम ! “अभी भी वक़्त है.. जान अभी भी है अटकी, बचाओ मुझको..!” मैं घूमता हूँ सरपट, पकड़ने आवाज़ को आवाज़ से इंसान को, आती जगह- जगह से जो हिलते परदे के पीछे से, घुमते पंखे पे लटकके बिस्तर के नीचे, किचेन के अन्दर से, नाच पड़ी कटोरी, खडा हो जाता बेलन उलट थालियाँ बजती सिर पीट एक दुसरे से पलट देता मैं सब अर्तन- बर्तन, मच जाता एक नया शोर, फिर आंकता अव्वाज़ का स्रोत, खडा मौन जो शांत पडा, दबा अभी अभी कि फिर चीखता है, पीटता जोर- जोर बाथ रूम का दरवाज़ा, मैं भागा मुड, दरवाजे तक वो चीख रहा फाड़ गला रुआंसी आवाज़ में, “आजाद करो मुझे.. अभी पहनी नहीं मैंने चूड़ियाँ, लडूंगा आखिरी सांस तक.. आखिरी आस तक..!” पीट रहा दरवाज़ा, फाड़ रहा गला दरवाज़ा बंद कर अन्दर से, फोड़ता वो सिर, समझ में नही आता, कैसे करू इसकी मदद ?, खोलूं कैसे घुस अन्दर इसे .. हो बेचैन, घूमता मै इधर उधर मलता पसीजे हाथ पे हाथ, कि फिर आती है आवाज़ सिसकते, रुंधे गले से इकबार “मैं नहीं पैदा हुआ मरने के लिए.. गड़ने के लिए, सड़ने के लिए ..” कि पहचानता हूँ इसबार आवाज़ ये मेरी, बनाकर है छलता कौन बैठता जा, हिलता थोड़ी देर डोलती कुर्सी पे, विचारों की डार्विन थोड़ी देर बाद शांत हो गया अपने आप, डरता , डराता संघर्ष के लिए उकसाता है बदल-बदल के भेष, जगह, आवाज़, अंदाज़ सब झकझोर देता हैं मन मस्तिष्क, मौक़ा पाते ही, रह -रह कर इसीतरह.. सिसकता है अंतर में मेरे घंटो बैठ, उपाय, अनसुना फिर इसे मैं करता हूँ बदलता हूँ मन, सुनता संगीत या ( हेडफोन लगाता ) कुछ खुदी गुनगुनाता मैं, प्रवेश करता आँख बंद कर, डोलती कुर्सी से धुनों की दुनिया में, अँधेरे में जलते, हजारों तार धुनों के नस –नस में घुस जाते, धनकते हैं पुनर्जीवित करते, कण कण को बिना बताए, सब सुन्न कर एक मीठी आवाज़ भरती लंबा अलाप तभी उठती है सूर्यास्त सी, मद भरती खींच ले जाती बिस्तर पर अचेत कर, गिरा देती छूती है, सहलाती है आँख, कान होंठो पे फूंकती है, महकती है हवा .. बोलती अचानक, सुर छोड़ के दोनों कानों में मेरे जिह्वा डालकर गिज –गिजी “ सुख भोगो, दुख छोडो सत्य यही एक, हर जीव का जंतु, वनस्पति का, देवता भी मांगते हैं मनुष्य तन, दुःख भूलने के लिए, सुख भोगने के लिए यही मूल है, आधार है हर गति का, चरा-चर मस्त है, बस तुम वंचित पीछे किसी निराकार के, अनजान के हर क्षण दुःख, हर क्षण कष्ट भरे उसके विचार में, त्यागो ! हर लक्ष्य का आधार है सुख, परम लक्ष्य सुख, मेरी सुनो बस..! सुन रहे हो ना..? हाँ तुम अनुभव भी करे हो.. मत रुको..! आओ.. अच्छा मैं आती हूँ स्वयं लो आ गई...’ हाँ इसी तरह वो आ जाती मुझमे, या मैं उसमें, नशे में सुस्त, उन्मुक्त! उसके होंठ और करीब, पानी – पानी.. घुलता –सा मैं .. धुंधली नजर में चमकता है तभी उसके होंठो पर रौशनी लाल, लपट आग कि तभी तलब लगी सिगरेट की, माचिस उठा कर, उठकर एक झटके में खिड़की के पास आ जलाता हूँ, उसे छोड़ वहीँ बिस्तर पर, धुंआ –धुंआ साफ़ होता है खिडके बाहर अन्दर उसकी काया लेटी बेड पर धुंधली होती जाती है.. फिर भी वो बैठी .. प्रतीक्षा करती.. मैं धुंआ छोड़ता हूँ अंदर से अन्दर, और फिर आने का संकेत धुंआ – धुंआ से हाथो से करती वो, कि मैं चेहरे तक पहुँच जाता हूँ और पहचान लेता हूँ बेन्थैम को, उसकी जलती आँखें अँधेरे में .. चमकते शीशे में मेरा चेहरा मेरी आँख लाल लाल लालच से, जलती हुई कामेच्छा से, जल गया हाथ मेरा इधर सिगरेट से, ये लो जला बैठ मैं खुद को, अब मरहम ढूंढो जो की है नहीं, थोड़ी देर में ठंडा हो जाएगा, मै जाकर ऐसे ही बैठ जाता हूँ मेज़ पर देखते हुए काले पड़े, दाहिने अंगूठे को की यही जलता है हमेशा, जल- जल के काला हो गया, “बेन्थम सुखवादी है..” हाँ मैं भी जानता हूँ इसीलिए तो सिगरेट पी .. ”वास्तव में वो सुखवादी नहीं आड़ मे सुख के.. ट्रांस के खेल में नशे के दम पर.. आखिर में म्मात्र दुःख वादी है, क्षण- भंगुर सुखवादी है.. क्षण भर में भंग होता क्षण भर में दुःख देता है..” हाँ मैंने अनुभव किया उसी एक क्षण में.. दर्द, जलन की एक सुरंग! पसीना नाक से मेज़ पर टपकता है तभी देखो ख्याल ही कितना कठिन था, यार पसीना भी तो पोछना है.. वो फिर बोलता है बिस्तर लेटते हुए मेरी तकिया पे सर टेकते हुए, हाथ मेरे रुक जाते हैं पल भर के लिए की अब ये क्यूँ आया है? सोचते हुए .. उसे देखते हुए पसीना पोछता हूँ.. मैं कब से इससे बातें कर रहा हूँ? ये ऐसे ही आता है की मुझे पता भी नहीं चलता, और जल्दी जाता भी नहीं, डार्विन और बेन्थैम की तरह, ये बुध्धि साक्षात, स्वयं बुध्ध, इसे हराना मुश्किल है, इसने ही सनातन धर्म की घुटती अटकी आखिरी सांस को फूंक फूंक कर आखिरी सांस तक खींच लाया .. फिर हज़ारो साल के लिए .. सांस छोड़ता था शास्त्रार्थ जीतकर, देखो हज्जारों बुध्ध गण उसके क़दमों से लिपटे, जो हारें है अभी अभी, शास्त्रार्थ में राजा का गिरा हुआ चेहरा मंत्री की तरफ देखता क्रोध में, कटता मंत्री का गला, “क्यों बुलाया तूने उसे?” जुर्म बताया गया इस तरह अनगिनत को, अनगिनत कटे खून में लतफत गले एक रील में एकाएक दौड़ जाते है मेरे माथे पर जोर –जोर से, पतली रेती की आवाज़ मोटी होती आरा मशीन की आवाज़ में घर्र... बुरादे उड़ रहे है मोटा तना कट रहा चीख रहा जोर जोर से तना नहीं गला कट रहा शायद, किसी पेड़ का खून के फव्वारे .. मगर लकड़ी से कैसे ..? सचेत होता हूँ की अपने आप माथे पर रुमाल रगड़ना हाथ मेरा बंद कर देता है, फिर भी गले में पसीना रहा है चुह-चूहा नहीं..नहीं अब नहीं पोछूँगा न सोचूंगा.. पानी पिऊंगा गला सूख गया है, की फिर खून से लतपथ प्यासे गले दिखाई देने लगते है की मैं एक झटके में उठा एक गिलास पानी पी जाता हूँ.. रगड़ से गरम, जलते माथे पर एक गिलास पानी उड़ेल देता हूँ, ठंठा ..ठंठा ! एक धार बनाकर धीरे-धीरे ये शिव लिंग सब सोख लेता है, हाँ ये पत्थर हो गया है, की तभी आँखे खोलता हूँ वापस मेज़ पर पहुँच कर खींच लेता हूँ किताब इतिहास की.. नहीं इतिहास नहीं पढना.. फिलोसोफी.. नहीं वही सब इसमें भी है सिर्फ बकचोदी कुछ नहीं पढूंगा, आज केलिए बहुत हो गया सोना थोडा अच्छा होगा.. लेकिन मेरे बिस्तर पे तो वो पडा है जाग रहा है, इंतज़ार कर रहा है अपने टर्न का, मैंने बताया था न इतनी आसानी ये नहीं जाता जैसे बाकी सब, पर इसका एक नाम, एक चेहरा नहीं है, अनेक है ये कहता है फिर भी ‘सब कुछ यही है’ एक है सब, “अद्वैत सत्यम, अद्वैत सत्यम” सूक्ति बध्ध कहता है अद्वैत है ये ! मैं देखता हूँ इसकी आँखों में और अटक जाता हूँ इनकी मुस्कान में वो उठकर पास आता है मैं पीछे हटता हूँ उसकी मुस्कराहट गहरी और रहस्य मयी होती जाती है, मैं और पीछे हटता हूँ की वापस कुर्सी पर धप्प से बैठ जाता मैं, सन्न..सन्न..सनसनाते .. शून्य की आवाज़ बढती जाती है, मेरे कानों में मैं शिथिल और शिथिल होता .. चेतने की कोशिश करता हूँ तो रहस्य बढ़ता है.. नहीं कुछ नहीं सोचूंगा.. रहस्य से मुझे डर लगता है, और यहाँ पर आकर सोचना, संभव ही नहीं, लहरों की सुरंग, और गहरी होती जा रही है, एक गहरा शून्य बनता उसके आँखों में, कि बोलता है, गर्जन स्वर में चारो तरफ तेज़ घुमते मेरे, “मुझसे डरते हो..पागल कहीं के.. मैं भगवान् हूँ..” मैं उसे देखने की कोशिश करता हूँ घूम घूम कर पर वो दिखाई नहीं दे रहा शून्य हो गया और घूम रहा है मुझे शून्य बिंदु बनाकर चारो तरफ मेरे, बड़े वेग से ना रफ़्तार की आवाज़, ना कहीं हवा का टकराव, मेज़ पे, कुर्सी पे, न मेरे बदन पे कोई छुअन, तो मैं कैसे देख सकता हूँ भला? गति को कभी.. आखे बंद करता मैं कस, उड़ते अनु कण, घुप्प अँधेरे में वो फिर बोलता है, कण-कण से “चलो छोड़कर सब.. शून्य में.. रसातल में.. साथ मेरे मुझमे मिल जाओ.. पूर्ण स्वरुप निरुप, निर्गुण, सत -चित-आनंद स्वयं भगवान् हो जाओ..!” शंख नाद करता है अपनी आवाज़ को बदलकर जताता है की शंख भी मैं हूँ सब जगह सबकुछ मैं हूँ, पर शंखनाद से मुझे है क्लेश, रोंगटे खड़े हो जाते है और आँखे खोलता हूँ खुलते ही चित के पट, और तुरंत जाकर गिरता हूँ धप्प.. खाली बस्तर पर बिना कुछ सोचे शून्य के हैंगओवर में थोड़ी देर और मैं रुकता हूँ.. पर शांत नहीं रह सकता शून्य का ख़याल हटाना है तो, और फिर मैं उठ बैठता चारों तरफ देखता, हाँ वो चला गया..! कहीं छिपा भी हो सकता है मन में संदेह बना रहता है घंटो उसके घंटों जाने के बाद भी डर, पसीने से नहा गया पर नहीं उठा, घुमाता रहता चारो तरफ नज़र सचेत और सचेत रहना ही एक रास्ता है, क्यों की बहोत चालांक है ये स्वयं बुध्धि है, ऐसे नहीं जाएगा.. बिना मुझे ले जाए अपने साथ ! कांपते हुए होंठो से बडबडाता मैं बैठा चुक्की-मुक्की मार, डर लगता है, उसके आने पे, साथ जाने में कहीं फिर वापस लौटा तो.. और कौन लौटा है? वहाँ से आजतक कोई नहीं ! हज़ारों साल वहीँ रह जाते सब दीमक लग जाती है यहाँ..! कीड़े पड़ जाते गड़ने के बाद मरने के बाद नीचे ज़मीन में जला दिए जाते या फिर, या फिर.. वहीँ पहाड़ों पर पीले -पेले नुकीले दांतों से खीच ले जाते है अँधेरे घने जंगल में बिल्ली जंगली, काले भेड़िये सब और दूरी शून्य से मौत की है कितनी.. कोई बता पाया है क्या? मौत से डर लगता है, किसको नहीं वो काल है ..! जो रोज़ आता है चेहरे बदल कर भगवान् बनकर है ! गांधी, इसा, बुध्ध, पैगम्बर, दिगम्बर, शंकराचार्य सब भगवन ही तो बने, ये भी सही है काटने लगते एक दुसरे को, रगड़ –रगड़ के एक के उपर एक, मांझे दिमाग के, विचार के और लेटता हूँ, सब ढीला छोड़ बिस्तर पर हो ढेर, आँखों को ढंके एक हाथ से, की तभी उसने दुसरे हाथ से मेरा पकड़ते हुए हाथ सधी आवाज़ बोलता है...वो, “बौधिक सुख है दूसरा जंजाल संसार के बाद.. अंतःकरण, आतंरिक सुख सवेद्नाए मानवीय मूल्य इश्वर की आवाज़ .. धत्त ! इश्वर तो मर चूका है कब का बरसों का पैदा होने पहले ही इंसानों के..!” वो बोलता ही जाता आवाज़ मधिम से मधिम, और मध्धिम रौशनी, मैं कही और पहुँच जाता हूँ ढेबरी से आती हुई, मध्धिम रौशनी माँ ! मैंने आवाज़ दी तवा चढ़ा दिया झट से उसने रोटी बना रही है.. मुझे भूख लग गई है उसे सब पता है की मैं भूँखा हूँ कई दिनों से उसकी आँखों में आंसू आ गए.. मेरे भी.. की तभी कनपट्टी पर पीछे पिता जी का थप्पड़ चट्ट! और मैं वापस पढने लगा अक्षरों पर सरकती ऊँगली का पीछा करते उनके, अरे हाँ मुझे याद आया दिन ये वही है सीख गया था जिस दिन मैं एक शब्द में अक्षरों को मिलाकर पढना.. वो थप्पड़, पिता जी का गुस्से वाला चेहरा खाने के पहले कहानी माँ की! मेरा पेट खाली आज भी मैंने दूसरा हाथ पेट पर रखते जाना, “कुछ खालो पहले हर चीज़ के लिए शक्ति चाहिए” मैं उठ बैठा सोचते उसकी बातों को .. इसने मेरे मन की बात बोली है, मैं उठकर किचन पहुंचा वो बैठा रहा वहीं.. मेरे खा चुकने का इंतज़ार करते, कोक्रोच दौड़ते रहे इधर बर्तनों में जेब में सुराख बहोत पुरानी आज भी होटल उधार दो चार दिन पैसे आ ही जाएंगे लेकर किसी दे देंगे उधार या, उपहास भरी मुस्कान खेलती उसके होठों पर, मुझसे नज़र मिलते ही, ताला कहाँ है? ये रहा...गिरा बंद इधर, धडाक! उसे अन्दर ही बंद कर उतरता मैं सरपट सीढियां मार्केट आ गया, भूंख मिटाने खाएंगे फिर देखा जाएगा.. की तभी उसकी मुस्कान उपहासी चुभी पीठ में, वो देख रहा बंद दरवाज़े से, नहीं खोलूँगा दरवाज़ा, नहीं जा रहा अब वापस ही रहने दो बंद मुस्कुराते उसे वहीँ ! की अचानक लोग देखने लगे मुझे सब मुझे .. “हाँ नहीं जाऊंगा वापस उस कमरे में न पानी, ना हवा, पहुँचती जहां!” मैंने चीखकर सब कह दिया –सबसे फुसफुसाया किसी ने पीठ पीछे मेरे किसी के कान में, मगर मैं नहीं मुडूगा देखने, कहने दो मुझे पागल, आगे बढ़ जाता मैं, ब्रिज के नीचे कुछ अंडर ग्राउंड लोग पड़े हैं, कुछ घूम रहे सो रहे है कुछ अपने घर इस में, घर्र र्र्र्रर्र्र्रर..से गुजरी बड़ी गाडी एक उठाती एक पगले उसके सपने से सो रहा था चिथड़ा ताने कम्बल का अरे ये इशु है दयासागर, ज्योति का आरम्भ अचानक लगा मुझे चेहरा उसका चेहरा चाल भी गंभीर इशु चौराहे पर जाता गालिया देने लगता सर पकड़ के गिर जाता झट पटा रहा है लोटकर मार रहा उसे जैसे कोई दमतोड़ कर, भीग गया रो रो कर, और साफ़ हो गया दीप्त हो गया उठ बैठा फिर और मुझे देखता है की मैं भी उसे एकटक देखता, अम्बुलेंस ट्राफिक तोडती निकली एक और उड़ा ले गई उसे, उफ्फ्फ..आख मेरी बंद हो गयी मेरे हाथ से दबकर अपने आप मुड गया दूसरी तरफ, नहीं देख सकता मुड़कर क्या हुआ उसका हाल वापस सड़क इस पार मारवाड़ी चाय की दूकान पे, झट चाय थाम होंठो से लगाईं की आवाज आई अल्ल्ला हूँ अकबर!.. गूंजता है लाऊड स्पीकर धीरे –धीरे दूसरी आवाजें होतीं हैं साफ़, एक साथ ढेर सारे लाऊड स्पीकर अपनी -अपनी राग रहे अलाप कुम्भ मेला रात है झिलमिलाती हुई, कोई खो गया है किसी का रोता है वो लाऊड स्पीकर पे लेकर किसी का नाम, मैं घूमता हूँ, की किस लाऊड स्पीकर से किधर से आई आवाज़ ऐ ये तो मेरा नाम ले रहा है.. कौन है मेरा बिछड़ गया? मैं भागता हूँ, भीड़ को धकेलते रेत भर भर के चप्ल्लों में उड़ाते, मुड जाता जिधर भी मिलते मोड़, सब तरफ से आती है आवाजें बैठा पैर मरोड़, फिर भी आ रही है आवाजें भैया..भाभी, अम्मा, बिट्टी बाबा, गाय का बछड़ा अम्मा अम्मा चिल्ला रहा और मैं बैठा लिए पैर आंसू झरने लगे और धुल गया मेरा पर मैं फिर भागता हूँ सरपट फिर मुड़ता हूँ कई मोड़ पी..पी..बजा हॉर्न चाय ख़तम हो गयी भूख भी दब गई उसने पैसा भी नहीं माँगा, थोड़ी देर और बैठते है, बैठ गया, वो भी साथ आते जाते पैरों के ऊपर निगाहें टिकी उसकी अपलक चमकती हैं पुतलिया उसकी दो चिकने परों के पीछे उडती हुई हाफ स्कर्ट से चिपकी थोड़ी देर फिर वापस दुसरे कमर पे जा अटकी, नज़रें मेरी ओशो –सी उस सिगमंड के चेहरे पर लगी की लगी, मुझ पर लौटी उसकी नज़रे अचानक, की मैं हडबडा कर खडा हो गया, तो उसने फिर हाथ पकड के बैठा दिया, एक चाय और आ गई मेरे हाथ, चुस्की ली, उसने मुस्की “यही वजह सारी तुम्हारी उथल पुथल की मानसिक” साइको एनालाईज या प्रोजेक्शन पर उसने कहा फिर मेरी आँखों में देखते हुए गहराई से, मैंने नज़रें हटा ली, “इसे कोप करना कहते हैं” मैं दूसरी तरफ घूमा तो आ सामने खडा हो गया छोड़ता ही नहीं मेरी आँखों को, थर-थरी उठने लगी चुभने लगी और तेज़ उसकी आँखे, “डिस्ट्रक्शन की तरफ बढ़ रहे हो..” झड़ी लगाने लगा वो बीमारियों का, वो खुद बीमार ! बिमारिया ही देखता मेरे अन्दर हमेशा, उड़ाता मैं लगातार उसकी बातों को एनालाइज कर पलट, वो भी कठोपदेशी ठूंसने का यत्न कर रहा नॉनस्टॉप, मेरे मस्तिक में बिना बात, “सेक्स से समाधि..” उसका चेहरा दीप्त हो गया और साक्षात ओशो- सी मलिन मुस्कान सिगमंड सा दिमाग बता गया हज़ारो काम्प्लेक्स सबकी जड़ और उपाय एक “सेक्स!” खट्ट! पूरे जोर से पटका उसने सर पे मेरे उसने निर्णायक आवाज़, खून मेरे हाथों से रिसने लगा इधर टूट गई मेरे हाथ में गिलास, सब मेरी तरफ देख रहे, देखा मैंने उसका अलाप मध्धिम पड़ता है पर अभी कुछ-कुछ सिर्फ मुझसे ही कर रहा बात, अभी भी लगातार की मैं उठ खडा हुआ, रफ़्तार मे भागती एक रस्सी सा लाइटों के बैरियर, तोड़ता ठोकरें खाता मैं सड़क पार ही जा रुका फंसीं साँसे खीची और हाथ देखा! अँधेरा है इधर भी, भागा भरते डग वापस अन्दर! सीढियां चढ़ते हुए इंट्यूशन होता है अकस्मात पर नहीं साबित होते ये पहले की तरह, बहोत दिनों से तो मानना ही छोड़ दिया तब से, जब से गलत साबित हुआ उस बार की हुआ था की वो आ रही है, सरस्वती घाट आरती के दिए हर घंटिया तक गाने लगी थी हवा में झूम कर “हाँ वो रही है !“ मैंने भी मुस्कुरा के आवाज़ मौन भाषा “हाँ मुझे पता है वो आ रही है’ कहा था मैंने, सबसे सैकड़ों सीढियों से चढ़ते हुए, कनेर के फूल से, नदी यमुना से बैठा रहा देर रात तक मेज़ की ओरों से टपकते ओस, बरगद के बरसते पत्ते; सुबह तक भीगता हुआ, शादी से पहले तुम एक बार यहाँ ज़रूर आओगी, जहां हम मिलते हुए, ये इन्त्युशन था या चाहता था आज भी भ्रमित करता घंटो, चाभी कहाँ गई ? कहीं गिर तो नहीं गई.. तलाशता हूँ जेबें, दरवाज़े पे खडा (कपडा खून से रंग जाता है) मिली यहीं गिरी है, जाते वक़्त गिरी या अभी ताले में चाभी लगा घुमाता हूँ की तभी दूसरा ख्याल खुलता है, वो अन्दर ही होगा अब तक? नहीं वो गया ! दरवाज़ा खुला एक झटके में फट! कोई नहीं है, मैं अन्दर, फिर बंद फट! स्विच ओंन लाइट, घुमा पंखा फररर दाढ़ी भी बढ़ गई है, शीशे दिखा साफ़ अभी भी मेरे जैसा ही है, मेरा चेहरा बकवास बंद! मैंने खुद को डांटा शीशे में देख, इन्त्युशन याद आया आया था सीढ़ियों पर, आते हुए जो अचानक खीडकी के पास जाते हुए फिर सोचा मैंने, क्या तुम आज भी आ सकती हो? खिड़की पर खरोचे उसके नाम पर फिराते हाथ मैंने पूछा, शादी के इतने सालों बाद भी यहाँ आकर इस कुर्सी पर, क्या बैठ सकती हो तुम? नहीं तुम्हारा जवाब हाँ मेरा इंट्यूशन, कि ये मात्र है प्रबल इच्छा मेरी, आज फिर मगर तुम आकर बैठती हो दुल्हन के जोड़े में, कुर्सी पे और मैं पलट कर खिड़की से देखता हूँ तुम बैठी हो.. आधे चन्द्रमा ने पूरी भर दी चांदनी मेरे घर में धुल गया सब कुछ जैसे, दूध से चमकते है सितारे सफ़ेद जोड़े में तुम्हारे लाल, लटकते हुए चुभते है ये उर में, की ये हिलते हुए “ये शादी का जोड़ा पहन के क्यूँ आई हो?” पूछता हूँ मैं दूर तिनगते हुए तुम्हे बता चुका हूँ कितनी बार कि शादी जोड़ा तुम्हारा (जिसे देखा भी नहीं एक बार) रात भर दबोचा था मेरी जान शादी थी तुम्हारी जिस रात, तब से लेकर आज तक तुम जोड़े में ही दिखती हो, बार- बार मेरी चीखे सुनकर आँसू आ जाते उसके बाट वो कड़ी होकर, मुडती है दरवाज़े की तरफ की मैं बढ़ता अपना हाथ खीच लेता हूँ पीछे खाली, “हाँ हाँ जाओ पता है मुझे, तुम नहीं कि कभी आई इधर, ये मैं ही हूँ, कल्पना मेरी मात्र तुम फिर भी मेरी नहीं मानती, जानता हूँ तुम्हारा नियम आकर्षण विपरीत मैं जो तुम्हे बुलाता हूँ आज भी, और तुम आज भी, चली जाओगी ऐसे ही जाओ सुनती जाओ, मैं जो भी हूँ आज तुम्हारे कारण, तुम्ही ने कहा था, मैं आउंगी फिर तुम कभी नहीं आई, कहा था ये भी तुमने की हम अलग-अलग नहीं अद्वैत है, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ.. तुम आगे बढ़ो.. हाँ मैं आगे बढूँगा, टूटूगा नहीं ! मैं खुद मुड़ जाता हूँ, खिड़की की तरफ काली रात है, बल्ब की पीली रौशनी, मेज़ कुर्सी सरकाता हूँ करीब, खिड़की के “मैं आगे बढूँगा..ज़रूर बढूँगा “ बडबडाता हुआ मैं आगे लिखता हूँ, खोल लैप टॉप “आगे बढ़ना, प्राप्त करना शक्ति ज्यादा से ज्यादा, ही मनुष्य का मूल जीवन तत्त्व है “ दाहिने से आती आवाज़ झट मुड़ा मैं उसकी तरफ, पीली रौशनी में पत्थर सा ज्ञान लकीरों से खर्चा चेहरा ऐसा तेज़ की एक ही झलक में झपट ले आधी शक्ति, सामने पड़े जो भी सही वक़्त के इंतज़ार में था ये गया नहीं था, मेरा मन हुआ पैरो के पास बौठने का उसके, कि पहले ही मुझे इशारा कर वहीँ बैठे रहने का, वो खडा होता है कि और उंचा हो गया और मैं बैठे बैठे नीचे पैरों के आ गया, तो मैं भी खडा हो गया मिलाते हुए नज़रें उससे, मुस्कुराता है वो, हरकत पे मेरे अच्छा लगा उसे अभिमान मेरा, निश्चित आधा चेहरा पीला, आधा सफ़ेद भूत सा लगता हा जिंदा ये, पर मैं अड़ा हूँ, तो खडा हूँ! “कुछ ही लोग पैदा होते हैं जो हो सकते हैं अतिमानव, सम्प्रभु, स्वामी .. बाकी लोगों को उसे पहचान कर उसके विस्तार में, उसकी शक्ति में, फैलाव में झोंक देना चाहिए खुद को, उनको तुममे सामर्थ्य है ! मानव की सीमाओं को तोड़कर शक्तिया अर्जित कर अथाह, समूर्ण मानव, अतिमानव बनने की..’’ पपडिया गिरती है तभी धीरे-धीरे पत्थर की, चेहरे से उसके और सम्मोहन, और तेज़ बढ़ता जाता है चेहरे पर, नीत्शे के मैं जड़ीभूत वो बोलता जा रहा है “प्रभाव बनाना दूसरों पर मस्तिष्क के गहराई तक, ही मतलब है हर हरकत का, इंसान के जितने लोग तुम्हारे प्रभाव में होते हो उतने ही शक्तिशाली, आप ही प्रभाव मे बहोत शक्ति है शक्ति का उच्च रूप है, एक आवाज़ पे लाखो, करोडो होते है कुर्बान, प्रभाव से प्रभावशाली के, शक्ति शाली के, सर्वशक्तिमान के ..” हिटलर ! हाँ हिटलर है ये भाषण देता हुआ करोडो को जैसे, पहचान गया मैं इसे एकाएक अभी, नेपोलियन उड़ाता लाखो जान, ये अलेक्सेंडर महान की तभी पढ़ लेता है वो मेरी आँखे प्रभावहीन उससे, और वो पास आता है और, पूरी शक्ति के साथ हमलावर बोलता है की चलाता है तलवार “शक्ति को तुम ऐसे समझो, होती तीन सबसे प्रभावशाली जो, पास ऋषि के, सिद्ध पुरुष के जो हिला सकता है कोई भी कोना, कहीं का बस में पूरी प्रक्रति उसके नाचती है, अद्यात्म शक्ति से, वैज्ञानिक, कलाकार तीसरा बदल सकता है जो सभ्यता पूरे मानव जाती की, अभिव्यक्ति से मात्र, महामानव बन स्वयं, गढ़ सकता है लाखो फिर, क्षण भर में..!’’ विचलित हुआ मैं, गोल घूमता एक चक्कर, अपना ही मारता मैं सवाल दन्न सपाट उसके चेहरे पर, जो सुनकर ‘तो क्या करोगे जब नैतिकता जाएगी खप?’ और सपाट हो गया, चेहरा पत्थर उसका कूटता हूँ सवालों से उसे, और मैं “क्या होंगे मानव जब नहीं रहेंगे, उनके मूल्य ही?’ उसका चेहरा कुट गया सिल सा, “जानवर वापस जंगली, होगा क्या तुम्हारा अतिमानव?” वो पढता है कुछ देर अंतर मेरा, सूंघता है शक्ति मेरी, एक सांस ले, बोलता है अपनी ऊँगली घुमा “मूल्य भी बदलता है मानव के साथ, अन्तःकरन, ये स्वयं इश्वर की आवाज़, निर्मित किये गए, घुमाने वाले गोल-गोल बंधी बुध्धि के, गहरे गड़े खूंटे हैं मात्र ! उंचा और उंचा चढ़ता है, विवेक जब खुलता है आकाश उचे कद के, सिर के नीचे कुचलना तो पड़ेगा ही, है अगर बढ़ना, अतिमानव स्वच्छंद, स्वयंकृत, सम्प्रभू अपना एवं समस्त का, ऐसे मूल्य स्थापित करता है, जो और शक्ति और मुक्त करता है इंसान को ! बिना थोपे, बिना रोके संयुक्त करता इंसान को!..” किताबों के कठिन शब्दों की तरह, उड़ रही अब बातें, सिर ऊपर से.. वो बोले जाता है, मैं शिथिल हुआ कुर्सी पे, तानाशाह से रिशिमय होती जा रही उसकी आवाज़ कि मुझे नींद आ रही, या मूर्छा ? कि हो रहा किसी और देश में प्रवेश... कुछ कदम आकाश में घूम रहे चक्कर काट, किसी शिकारी जानवर से, एकसाथ नहीं ये आकाश नहीं है.. मैं ही उल्टा पडा हूँ, और झट से पलटता मैं, की देखता हूँ घिरा हुआ मैं किसी खरगोश –सा गड़े पैर मेरे रेत में, जैसे जाल मे, वो चार-पांच काट रहे चक्कर, चारो मेरे ओर ले भाला हाथ, सिर से पैर कपड़ा बाँध सब की जैसे मार देंगे गर तनिक हिला भी मैं, धड-धड धड्का दिल, रेत झड गयी सीने से खौफनाक आँखों से घूरते मुझे सब, घुमते कहीं ये मुझसे तो नहीं डर रहे..? कि कहीं मैं कोई हरकत न करू? कि मुझे कैद किया गया है मरुस्थल में ? सोचता मैं जड़ पडा बस, होंठ हिल रहे सूखे पर, शब्दहीन वो भी कुछ नहीं बोलते बस, काट रहे चक्कर कौन है इन कपड़ो में लिपटा? मैं जान गया इन्हें, कही इसलिए तो नहीं.. “भाग !” “भाग ..भाग..भाग !” एक के बाद, सब एक साथ एक स्वर में मुझे देने लगे आदेश, “भाग..भाग..भाग !” और तेज़ गर्जन स्वर में, दिखा -दिखा कर भाले की नोक, मार देंगे जैसे अभी, ना भागा तो मैं पसीने से तर- बतर, पड़ा स्तब्ध शोर करते भाग-भाग का, ज़मीन रेतीली में धंसने लगे भाले, खचा –खच, की मैं भागा ज़मीन छोड़, वो सब मेरे पीछे, एक साथ एक के बाद एक मारते भाला फेंक, कि बचता बचाता मैं, भागता चीखता .. “मैं जानता हूँ तुम सबको..! तुम भगाना चाहते हो मुझको, पर भागूँगा नहीं मैं..!, ना तुम लोगों की वर्दी पहनूंगा.. कितनी भी कर लो कोशिश, कदापि नहीं !” चिल्लाता मैं पलट देख उनकी ओर, भागते हुए वो निकालते है और फिर फेंकते है, दौड़ते हुए भाले बार –बार, बना मुझे निशाना लगातार भागते हुए भी मैं अड़ा हूँ, वो डराना चाहते है, डराकर ही मारना चाहते है पर आत्महत्या नहीं करूँगा.. मैं भागता, रेत उडाता भाला एक सटीक मेरे, कदम उठते ही धंसता मेरे पद चिन्ह पे एक हाथ और भीग जाता है खून के फवारे से झट सोख लेती रेट प्यासी लहू की, की फिर फेंक दिया जाता भाला, खीच के और फिर मैं आगे, भागा ताबड़ तोड़ पडा, उठा, फिर भागा जी तोड़ पद चिन्हों से इस्ट रक्त लाल सींचता रेत सफ़ेद, भागता रेत उड़ेल .. की तभी सीने आ धंसा घुटनों पे टिका, रक्त धार उछलते ही की सामने से कौन आया ? धुप लपट में लहराती आकृति, लाल चुनरी में आग लपकती, सिन्दूर में पोता पूरा चेहरा, टूटी चूड़ियों की माला, साफ होती और करीब की मैंने आखिरी सांस ली घडकका .. जागा फूलती हुई साँसों के झटके खाता.. की सोया भी नहीं था अभी ! छनकर खिड़की से आता आँखों में आ घुसा तेज़ प्रकाश सिर उठाते ही मेज़ से, दोपहर उठी की सुबह आ? घूमता हूँ सिर घडी की तरफ लटकी दीवाल से, अटकें है सब काटें पता नहीं..! बोलता हुआ बाथरूम में जा घुसा, तपता हुआ शिव लिंग, सोखता बूँद –बूँद दूध, शहद, अमृत! मंत्रोच्चार ध्वनि, धार की धीमी गति चटखती माथे पे मेरे, छिटकती जटिलतम ग्रंथि हो चूर –चूर, धूर धूर काले वीभत्स बादलों का भार बिजलियों के कोड़ों के दाग, पूरा साफ़ एकदम, नीला खुला आसमान हो गया मैं, फिर, नहाने के बाद ! शीशे के सामने टहलते, रुका भर एक झलक देखता उसे मैं, वो मुझे, कि निकल कर फ्रेम से जा बैठा वो मुंह फेर, कुर्सी पर पहचानता हूँ इसे मैं, है जो हूबहू मेरे जैसा ये, मैं जानता हूँ अच्छी तरह, मैंने ही तो रचा है इसे, ज्ञान से विचार, कल्पना शक्ति से, खर्च कर अपना अस्तित्व, ये है मेरा पूर्ण रूप, परफेक्ट ह्यूमन, लिवयाथान मैं, पूर्ण है फिर भी रोज़ जोड़ता कुछ नया इसमें मैं, तो रोज़ थोडा बढ़ता अपने आप भी ये ! कुछ मैं बदलता इसमें रोज़, ढलता अपने आप, इसके साचे में पूर्णतः इसी में ढल, पूर्ण हो जाऊँगा एक दिन केचुली की तरह उतार फेंकूंगा बचे पतले फरक का, दोनों के बीच का सम्पूर्णता और अधूर का, है क्यों की कुछ भी नहीं पूर्ण, पूर्णता स्वतः है अस्तित्व हीन ! वो कुर्सी पे बैठा, घूमता है कि शीशे में ही देख के उसे अनुभव करता मैं कल्पना शक्ति से, अभिव्यक्त हो मै पूर्णतः, परम आनंदित दोनों हाथ आप फैल जाते मेरे, घूमता आँख बंद कर गोल –गोल, गोल-गोल, अपनी धुरी पे, उछलती नदी में बह चली आकाश गंगा सूर्य मारते है चक्कर मेरे अनगिनत मूर्तियों की खुलने लगती हैं आँखे, भागती भीड़ लोगों की सिमटती है एक काया में, घने बादलों को चीरता एक चन्द्र आता है, की गिरता हूँ ज़मीन पे मैं इधर, मेरे कमरे में अकेला मैं, वो गया हिलती कुर्सी छोडके, मतलब बता के कि अभी वक़्त बहोत है, रिक्त बहोत है दूरी बीच की, मेरे और उसके पूर्णता की!
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