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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



मेघ न बरसे

संजीव वर्मा सलिल


मेघ न बरसे बरस रही हैं आहत जनगण-मन की चाहत। नहीं सुन रहीं गूँगी-बहरी सरकारें, क्या देंगी राहत? * जनप्रतिनिधि ही जन-हित की नीलामी करते, शर्म न आती। सत्ता खातिर शकुनि-सुयोधन की चालें ही मन को भातीं। द्रोणाचार्य बेचते शिक्षा व्यापम के सिरमौर बने हैं। नाम नहीं लिख पाते टॉपर मेघ विपद के बहुत घने हैं। कदम-कदम पर शिक्षालय ही रेप कर रहे हैं शिक्षा का। रावण के रथ बैठ सियासत राम-लखन पर ढाती आफत। * लोकतन्त्र की डुबा झोपड़ी लोभतन्त्र नभ से जा देखे। शोकतंत्र निज बहुमत क्रय कर भोगतंत्र की जय-जय लेखे। कोकतंत्र नित जीता शैशव आश्रम रथ्यागार बन गए। जन है दुखी व्यथित है गण बेमजा प्रजा को शासन शामत। * हँसिया गर्दन लगा काटने, हाथी ने बगिया रौंदी रे! चक्र गला जनता का काटे, पंजे ने कबरें खोदी रे! लालटेन से जली झुपड़िया कमल चुभाता पल-पल काँटे। सेठ-हितू हैं अफसर नेता अँधा न्याय ढा रहा आफत
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