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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



लड़की

संजीव वर्मा सलिल


समझती है चतुर खुद को नकचढ़ी लड़की बिगड़ती बिन बात के भी नासमझ लड़की। . छींकती है, खाँसती है आंग्ल भाषा में खुली आँखों पाल सपने नवल आशा के नहीं शृद्धा, तर्क की जय बोलती हरदम भड़कती है, अकड़ती है नासमझ लड़की . जानती निज मोल वह अभिमान करती है जो न हों सहमत उन्हें नादान कहती है अंधविश्वासी बताती बऊ-दद्दा को लाँघ सीमा घुडकती है नासमझ लड़की . देह दर्शन कराती है कहे 'हूँ बिंदास' रहे 'लिव इन' में बताती दोस्ती है ख़ास दोष जग को दे, न अपनी त्रुटि कभी माने पटाती पटकर किसे यह नासमझ लड़की * पेट पाले बारबाला इसे आये शर्म खुद परोसे नग्नता कह यही अभिनय-कर्म 'शो रहे जारी' बताती ज़िंदगी का मर्म बिखर फाँसी से लटकती नासमझ लड़की
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