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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



ताजमहल

रवि शंकर प्रसाद


मैं और ताज आमने सामने खड़े चुपचाप सोचते हैं l ताज का परिचय ? अगर मैं कहूँ कि यह मकबरा है तो लोग हँसेगें जहाँ रहने को घर नहीं वहां यह आलीशान मकबरा ! अगर मैं कहूँ कि यह प्रेम निशानी हैं तो डर हैं एक सवाल का l क्या यहाँ बाकी के लोग नफरत करते हैँ ! कहाँ है अन्य प्रेमियों की प्रेम निशानी ! अगर मैं कहूँ यह बेजोड़ कलाकृति है l लोग पूछेगें ऐसी कलाकृति अकेली क्यों है ? मुझे अनचाहे कहनी पड़ेगी, कारीगरों के हाथ कटे जाने की घृणित कहानी ! अगर मैं कहूँ यह बादशाहत है डरता हूँ, इस गरीब देश में फिर कोई दूसरा शाहजहां न पैदा ले ले l ये सोच सोचकर मैं चुप हूँ सब कुछ कहते हुए भी बेचारा, निरपराध ताज चुप हैं हम दोनों सदियों से चुप है l ख़ुशी हैं विश्व में नाम दिलाने का गम हैं जो इसके कारण हुआ और जो होनेवाला हैं !
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