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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



ठूँठ

राजेश कुमार श्रीवास्तव


हे पथिक मुझे माफ करना। इस भरी दुपहरी में- तुम्हारी तपन मिटाने के लिए - मेरे पास अपने हरे कोमल पत्तियों की छाया नहीं हैं। हे पथिक मुझे माफ करना। आज इस निर्जन भूखंड पर- तुम्हारी क्षुधा मिटाने के लिए- मेरी सूखी डालियों में अब फल नहीं है। हे पथिक मुझे माफ करना। इस चिलचिलाती धूप में- तुम्हारी तृष्णा मिटाने के लिए- मेरी काया में अब रत्ती भर कहीं रस नहीं है। लेकिन, हे पथिक- कभी मेरी हरी- हरी डालियों में लदी - हरी-हरी पत्तियां, अपनी मृदु छाया से- मिटाती थी तपन अनगिनत पथिकों की। मेरी डालीयों से लटकते- मीठे रसीले फल- सदैव रहते थे तैयार मिटाने को- क्षुधा, तृष्णा गुजरते हर पथिकों की। मेरे पास की झाडियां और- हरी, मुलायम घासें, मेरी सहेलियां जिसपर बैठ कर आराम पाते थे तुम और, तुम्हे सुकून में देखकर खिल उठता था चेहरा हमारा । लेकिन आज तुम्हारी ही नजर- मुझ पर पड़ गई। अति दोहन के लिए तुमने- भर डाला मेरे नीचे की जमीं को- खतरनाक रसायनों से। अब मुझे मिट्टी से - नहीं मिलता- जीवनदायक खाद्य और जल। मिलने लगा है जीवननाशक रसायन। तुमने बढानें के लिए अपनी तपन- जला डाला मेरी हरी -भरी डालियों को- अब बिछुड़ गई मेरी सहेलियाँ भी, खडा हूँ मैं ठूँठ , नीरस अकेला। अब मैं असमर्थ हूँ- मिटाने में तुम्हारी तपन, क्षुधा और तृष्णा। मुझे माफ करना। हे पथिक मुझे माफ करना।
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