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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



बलात्कार पीड़िता

राजेश कुमार श्रीवास्तव


हाड़ है मांस है / लेती अब भी साँस है / सोती है, जागती है / भोजन भी करती है / फिर भी अब जीने की - नहीं उसमे आस है / बर्बर समाज की बनाई - ज़िंदा एक लाश है / ना रोती ना हंसती है / मिलने से डरती है / गूंगी ना बहरी फिर भी - ना बोलती ना सुनती है / गांव है, उसका घर है / लोग है बाग़ है / नीम का भी छांव है / कमरे का अन्धेरा कोना / टीस रहा घाव है / बापू है, अम्मा है / मीडिया का मजमा है / पुलिस -प्रसाशन का- चल रहा जांच है / डॉक्टरी रिपोर्ट बतलाये - आरोप बिलकुल सांच है / फिर भी जीने से उसको - साफ इनकार है / जल्द आ जाये ऐसी- मौत का इन्तजार है
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