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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



विध्वंस के सहारे इच्छित दुनिया के निर्माण की कल्पना पाले लोगों के प्रति

प्रताप नारायण सिंह


एक कल्पित प्राप्य की भ्रमित, उत्कट महत्वाकांक्षा कितने ही सुन्दर, सुखद प्राप्तियों को महत्वहीन कर जीवन को बौना बना देती है ! प्रकृति की कोई भी किरण इतनी आलोकित नहीं कोई भी गंध इतनी सुवासित नहीं कोई भी सौंदर्य इतना मोहक नहीं जो कल्पनाओं से जन्मे मादकता को क्षीण कर सके। मनुष्य को प्राप्त यह विलक्षण क्षमता वरदान और अभिशाप बन सतत फिराती है जीवन को सृजन और विध्वंस के दिन-रात में। रात का अँधेरा सब कुछ लील जाता है, अतः उसे अप्रियकर होना ही था। किन्तु संभव नहीं है रात को रोक पाना क्योंकि यह भी उसी स्रोत की उपज है जिससे दिन जन्मा है। साथ में यह भी सच है कि हर साँझ की आँखों में उजाले का स्वप्न पलता है, अतः दीपक को अस्तित्व में आना ही था। रोशनी करके अँधेरे को दूर रख सकते हैं- -यह सत्य अपरिचित तो नहीं, न ही कल्पित है।
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