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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



शून्य की ओर कदम बढ़ाते लोग

प्रताप नारायण सिंह


छा रहा कुहरा घना है, या सघन संवेदना है ? बुझ रही मुस्कान या स्याही पुती है शाम की? पुष्प का अवसाद या खंडित लड़ी अभिराम की? प्रकृति की अभिव्यंजना है ? रुग्ण कोई कल्पना है ? स्वत्व का उठकर धुआँ, है दृष्टि-पथ को ढँक रहा। क्षीण होता नित्य पौरुष सम्मिलन का, थक रहा। ध्वनित फिर भी वन्दना है, किस तरह की याचना है? फूलती नस बाजुओं की, चढ़ रही हैं त्योरियाँ ! श्वास से बहता अनल, हैं आँख में चिंगारियाँ! रूप यह कैसा बना है ! प्राण लावा में सना है। ज्ञात है किसको नहीं, जो विष रुधिर में घुल रहा ! कौन सी नव-चेतना है, द्वार जिसका खुल रहा? किस सृजन की योजना है? क्या, नहीं कुछ सोचना है ? वृहद यात्रा का, सहस्त्रों वर्ष की, अवदान क्या? घाव-चिह्नों का, मनुज-इतिहास के, संज्ञान क्या? भग्न सारी साधना है। शून्य पर ही जागना है?
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