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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



बलतोड़

अमरेन्द्र सुमन


अभी तक इस संबंध में मेरी राय यही थी यह कोई नासूर जख्म नहीं थोड़े समय की पीड़ा हो सकती है उन धैर्यहीनों के लिये वेवजह सारा घर जो सर पर उठा लेते हैं इस घाव से परेशान लोगों की कायरता पर हंसी ही आती सभी कहते खुद पर बीतती है तो समझ में आती है बात बलतोड़ ने दो-चार रोज से परेशान कर रखा है मुझे उठना-बैठना, चलना-फिरना यहां तक कि शौच में भी महसूसता हूँ जख्म की टीस जख्म कोई भी हो प्रभावित कर जाता है शरीर का एक-एक अंग समझ लो! पूरे-पूरे दिन भर की चंचलता के लिये एक अभिशाप से कम नहीं बहुत हद तक मर्द होते हैं लापरवाह अपनी नियमित की दिनचर्या से सुकुमार मुस्कुराहटों में छिपी मनोदशा से एकपक्षीय कार्यों के लगन से पत्नी के रुप में किसी औरत के घर आने के पूर्व तक तमाम विकल्पों के शीर्ष तक की योग्यता के बावजूद खर्च करता है वह अपनी उम्र का अधिकांश वक्त अपने आधिपत्य की एक स्थिर दुनिया बसाने चाहता है दोस्तों के बहकावे में भटकने की खुली आजादी दिवारों पर टंगी सजीव सी दिखने वाली तस्वीरों के साथ वह करना चाहता है अप्राकृतिक यौनाचार कितना महत्वपूर्ण है मर्दों के लिये पूरी उम्र की पुस्तक के पन्नों के बीच बोलती तस्वीर की तरह एक औरत की स्थायी उपस्थिति बिस्तर की ओट में जहां पूरी की पूरी रात पति के आने के इन्तजार में मोमबत्ती की तरह पिघलना उसकी आदतों में शुमार एक हिस्सा है अगली सुबह के लिये राशन-पानी का जुगाड़ फटेहाल में पूरे घर को बहलाए रखने की गैर तकनीक पढ़ाई पूरे घर की प्रचुर प्रतिष्ठा में छिपी होती है सामान्य सी दिखने वाली एक औरत वार्षिक आय सी उसकी हँसी

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