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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



अगर तू ना बदली होती

अमिताभ विक्रम


अगर तू ना बदली होती, कैसे बनती तितली कैसे उड़ी होती। उमर मेरी भी कब बढ़ पाती, गर तारीखें हररोज़ ना बदली होती। मैं भी लुफ़्त लेता इस जहाँ का हरपल, मौत के दिन अगर छुट्टी रही होती। हमारा साथ यों तो था सात जन्मों का, काश हर जन्म तू इंसान बनी होती। मैं पहुँच जाता जल्द ही जन्नत में, क़यामत की तारीख पुख़्ता ना रही होती।

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