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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



ऐ ज़िंदगी ले ले वो इम्तिहान बाकी

अमिताभ विक्रम


ऐ ज़िंदगी ले ले वो इम्तिहान बाकी, रह ना जाए तेरा कोई अरमान बाकी। जीवन की डोर सौंप दी जिसे मैंने, उसके दिल में रहा ना प्यार बाकी। दिल देना संभल के सनम बेवफा ना हो, मरोगे तो नहीं पर ना रहेगी जान बाकी। वो इंसान कभी मर नहीं सकता, लोगों के दिलों में है जिसके निशाँ बाकी। आ जा मैं तुझे अपनी ग़ज़ल बना दूँ, उससे पहले कि ना रहे नामोनिशान बाकी।

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