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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



आज फिर आसमान में अँधेरा था

अमिताभ विक्रम


आज फिर आसमान में अँधेरा था, जहाँ ना बच पायी निर्भया वो देश मेरा था। वो सिखाते रहे श्वास लेने-छोड़ने के गुर, जहाँ छोड़ी किसानों ने अपनी सांस वो देश मेरा था। हाजमें ने उनका खाना छुड़वा दिया, जहाँ लाखों ने खाली पेट दे दी जान वो देश मेरा था। अगर रुकता तो जान पाता हमें क्या ग़म है, जहाँ फ़ितरत से सैलानी सिपहसालार वो देश मेरा था। जब कुछ करने को आये तो जुमला दे डाला, जहाँ बातों का धनी हुक्मरान वो देश मेरा था।

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