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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



नियति

अमित पाल


पीपल का एक पत्ता, लंबे समय से पड़ा रहा, वामन आप्टे के कोश में, मूल से जुड़ने की क़वायद और शब्दों से खेलते, खाते-पीते,घुटते,हँसते-रोते- अब जाल सा दिखता है| नत होने का संस्कार लुप्त, मुर्दा गया है,रेखाओं का सम्राट- रेखा ही शेष है क्षितिज का, जन्म-चिह्ण के गवाह में, पूछा था एकबार स्मृति से. तीन सरल रेखाओं के मिलन से है त्रिभुज, जिसका आधार- युगों से नि:मग्न है सोच में, सिरहाने-पायताने से, आरोही-अवरोही यह है कौन ? प्रेम और द्वेष त्रिभुज के विचाराधीन क़ैदी| रेखा कल्पना है, नहीं तो दिख जाती लक्ष्मण-रेखा, अपरिभाषित, पिकासो का बिंदु, ट्रेन के प्रसाधन की दीवार पर बहता मानसिक मवाद | रेखायें मुक्त है, रेखायें बद्ध हैं, अद्वितीय नंगा फक़ीर घूमता है धरा पर, बमबारी के बाद अचंभित बच्चा ताकता है आकाश, रेखायें पत्ते की नियति है, रेखा- सरल है,वक्र है,कुटिल है |

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