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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



जीवनरेखा

अमित पाल


धुरियाँ हैं ,परिक्रमा-पथ है- महाकाश में लोटने को अभिशप्त, पथ नियामकों के अनुशासन से रूद्ध, शून्य और ईथर से जुड़ा, प्रेम शाश्वत है, पर यह किसी पेड़ की डाल से साँप के केंचुल सा, जुगुप्सा और भय से एक नक़लीपन भर देता है, जब उस सुबह या शाम, सूरज और चाँद एक साथ दिखे नील आकाश में, पथ भ्रष्ट हुये , नहीं न ? कोई विध्वंस,विनाश,विस्फोट. नहीं न ? दोनों के ह्रदय में थे कुछ अतिरिक्त स्पंदन, यह अस्तित्व है,होना है प्रेम का, राधा या कृष्ण-व्याकुलता में हर्ष का कंपन, धुरियाँ मिल जाती हैं एक सरला रेखा में, रेखा का होना ही मिलन है, जो सदा रात के गहराने पर . शाम की तरह आती है आकाश ओढ़कर, वह आलाप है, जो अनाश्रय गीत है,तान है और तराना भी, आलाप परिचय नहीं है, अपरिचय प्रेम है, परिचय-विध्वंस,विनाश-विस्फोट, धुरियाँ गुम्फित हैं.

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