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वर्ष: 1, अंक 4, अक्टूबर, 2016



एक सुबह

अमित पाल


सुबह का आकाश साफ था, दो दिन पहले- दो दिन झूमकर बरसा था बादल, आज धुले कुर्ते सा है, धोबी गीत की धुन पर धुला, नील-मांड़ संस्कारित,आस्तीन में आभिजात्य की गिलट-चुन्नी- इतनी साफ-सुफाई देख, आज सहमा सा है सूरज, कई बार डराती है पवित्रता-सुंदरता और निष्कलंक होना भी, धर्म के बिन्दुमात्र सोच के बिना, उपासना गृहों की चिकनी मर्मरी फर्श, अनायास ही उतरवा लेती हैं जूते-चप्पल, सुंदर और पवित्र की परिणति हैं, देव और देवियाँ, इन्हें सोचना है,बसाना है बिना स्पर्श- लाखों की संख्या में,हजारों मंदिरों के गर्भ-गृह में क़ैद हैं कब से- पिछली रात के कृष्णपक्ष का पाँचवां चाँद, भाँप लेता है यह झिझक-ठिठक, सूरज की आदत जानता है की वह दैनिक है - और जानता है कि सोने में मिला खाद ही उसका मेरूदण्ड है, जिसके बूते पकड़ता है, कान,नाक,गला और कभी सिर चढ़कर बोलता है, सूरज की इस कातरता को, चाँद ने समझा है आज, अपने सलज्ज नयन झुकाये, कुछ ही पलों में, वह विजय-मुस्कान के साथ विदा लेगा.

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