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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 94,अक्तूबर(प्रथम), 2020

उम्र

डॉ० प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'

रामदीन मिस्त्री ने जब नयी-नवेली लाल-लाल ईंटों की चिनाई मलाई जैसे छह बाई एक के मसाले से अपनी चमकदार करण्डी से की तो अधबनी दीवार की एक-एक ईंट सजीव हो बोल उठी। एक ने कहा, "अभी तो हमें ये पलस्तर और रंग-रोगन से सजाएंगे तब देखना हम कितनी सुन्दर और मजबूत हो जाऐंगी।"

तभी कुछ ईंटों की नज़र उनके सामने खड़ी पुरानी बरसाती पर गई, "वे बोली, "पर हमारे सामने तो ये पुरानी बरसाती खड़ी है पहले ये ही दिखेगी हम नहीं?" गुमसुम हो गई वे सभी।

दोपहर खाना खाकर थोड़ा सुस्ताने के बाद एक मजदूर ने आते ही मजबूत हथोड़े से बरसाती पर धमाकेदार चोट की, कि अधबनी दीवार की उंघती-सी ईंटें हड़बड़ा कर उठ गई। एक ने ख़ुश होकर कहा, "अरे देखो! ये लोग हमारे सामने की बरसाती को हटा रहे हैं।"

"ये...!" एक साथ कई एक-स्वर में चहक उठी।

तभी चोट खाई बरसाती ने कराहते हुए कहा, "ज़्यादा इतराओ मत! ये जो मालिक है न, ये हमारे मन की क्या जाने? क्या पता आज मुझे तोड़ रहा है कल तुम्हें तुड़वा दे।"

"जलोकड़ी बरसाती! क्यों बकबक करती है,चुप रह!"

"बकबक!... जानती हो मेरी उम्र क्या है?"

"क्या?"

" मालिक को देखा है न, जो सुबह अपने बच्चे के साथ खड़ा मिस्त्री को हिदायतें दे रहा था, न, मैं उस बच्चे से बस छः महीने ही बड़ी हूँ।"

"बस!" एक स्वर में बोली सभी। "अभी तो इसी ने बड़े शौक से बनवाया था मुझे; देख लो, अब ख़ुद ही तुड़वा रहा है। सोचो; कल को ये मालिक बदल जाए; जो भी कोई दूसरा आएगा। कहाँ-कहाँ से किस-किस को तुड़वाएगा कौन जाने?"

सुनते ही अवाक्-सी, स्तब्ध-पत्थर हो गई सभी ईंटे । '


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