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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



मंडप के नीचे


अपर्णा झा


मेरे मंडप पर जाने का किस्सा कोई बहुत रोचक तो नहीं कि वह संस्मरण का रूप ले सके...फिर भी...संस्मरण के नाम पर बस इतना कि 23 फरवरी 2000 को रात 11.55 पर मुझे मेरे मुंह को पूरी तरह से ढक विवाह वेदी(हमारे यहां मंडप नहीं होता,जयमाल नहीं होता.अब तो फोटोग्राफी का भूत जो कुछ ना करवाए )पर दूल्हे के बगल में बैठा दिया गया था जिसे ना मैं ना दूल्हे साहब ने ही एक दूसरे को कभी देखा और ना कभी बात की.विवाहस्थली रातभर पंडितजी के मंत्रोच्चारण से गुंजायमान होता रहा और हम 103 बुखार में ऊंघते रहे.बीच-बीच में दूल्हे जी की मंत्रोच्चारण में कुछ आवाज़ सुनाई दी तो मन को तस्सल्ली मिली....दूल्हा गूंगा नहीं है.उसके कुछ देर बाद मंत्रोच्चारण के बीच में अचानक सुनाई पड़ा..."वर अब वधू के पैर के अंगूठे को पकड़ इस शिला(सामने मसाला पीसने वाला पत्थर रखा हुआ था)उनके पैर को रखेंगे...खैर हो ऊपरवाले का, की चेहरे पर बनारसी साड़ी का इतना मोटा झाँपा(हमारे यहां सिंदूरदान से पहले कन्याओं का सर ढाका नहीं जाता है) वरना लोगों को मेरी व्यंग वाली हंसी दिखाई पड़ जाती और ना जाने कितनी ही बातें आग की तरह फैल चुकी होती.अबतक तो मेरा मिज़ाज़ शांत भी हो गया था और मन ही मन सोच रही थी..."चलो भर जिंदगी दूल्हे मियां तुम कितना भी पैर पकड़वा लो श्रीगणेश तो आप से ही हुआ....और वो भी ससुराल वाले समाज के सामने... कोई बात नही इसी सोच से ही अपनी पूरी जिंदगी काट लूंगी."अंत में फेरों की बारी थी और फिर दुल्हन को तो औरतें फेरों के वक्त ऐसे सहारा देती हैं कि जैसे दुल्हन को चलना ही नहीं आता...और फिर चेहरा ढंका...मियांजी का पेट थोड़ा खाया-पिया,कद लगभग एक-सी ही बिचारे मुझे संभाल ही ना पाए और ये जो दो औरतें मुझे पकड़ी हुईं वो मुझे भगाए जा रही...बिचारे दूल्हे मियां के लिये वधू और धोती और ससुराल सब तो नया था... एक पर से भी ख्याल हटा तो जिंदगी भर की कीर कीरी...मैंने फिर सोचा कि अब फेरे जब ले ही रहे तो आधे जीवनसाथी हो ही गए तो क्यों न थोड़ी मदद की जाय.फिर भगाने वाली चाचियों को इशारा से बताया कि मैं चल नहीं पा रही...बस क्या था स्थिति संभल गई ...पर सच्चाई यही कि हम अबतक एकदूसरे को नहीं जानते थे और ना ही पहचानते थे....और ये मंडप का ऐसा क्या जादू हुआ कि आज तक हम साथ साथ हैं.

अब जब विवाहों के आडम्बर को देखती हूँ,बाज़ार और खरीदारी देखती हूं तो सोचती हूँ कि हमने तो कुछ ऐसा किया भी नहीं और नाहीं सोच सकते थे तो जीवन की गाड़ी मध्यम गति से चल ही रही है.पर आज इतनी बातों का ध्यान रखते हुए भी आये दिन अख़बार की ऐसी सुर्खियाँ....आखिर ऐसा क्यों???


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