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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



गाँधी जयन्ती (2 अक्टूबर पर विशेष)
समग्र विश्वधारा में व्याप्त हैं महात्मा गाँधी


कृष्ण कुमार यादव


विश्व पटल पर महात्मा गाँधी सिर्फ एक नाम नहीं अपितु शान्ति और अहिंसा का प्रतीक है। महात्मा गाँधी के पूर्व भी शान्ति और अहिंसा की अवधारणा फलित थी, परन्तु उन्होंने जिस प्रकार सत्याग्रह एवं शान्ति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुये अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। तभी तो प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि -‘‘हजार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इन्सान धरती पर कभी आया था।’’ संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वर्ष 2007 से गाँधी जयन्ती को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाये जाने की घोषणा की तो अमेरिकी कांग्रेस में बापू को दुनिया भर में स्वतंत्रता और न्याय का प्रतीक बताते हुए प्रतिनिधि सभा में उनकी जयंती मनाने संबंधी प्रस्ताव पेश किया गया। दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के मुखिया रहे बराक ओबामा सहित तमाम हस्तियाँ गाँधी जी के विचारों की कायल हैं। उनकी माने तो अगर भारत में अहिंसात्मक आंदोलन नहीं होता तो अमेरिका में नागरिक अधिकारों के लिए वैसा ही अहिंसात्मक आंदोलन देखने को नहीं मिलता। निश्चिततः दुनिया का यह दृष्टिकोण आज के दौर में शान्ति व अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता को सिद्ध करता है।

यह एक सुखद संयोग है कि वर्ष 2019 में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाई जाएगी और इसी बहाने उनके विचारों को एक बार फिर से कसौटी पर परखा जायेगा। भारतीय इतिहास गवाह है कि उन्होंने एक ऐसे आंदोलन का नेतृत्व किया, जिससे हमारी पीढ़ियां आजाद हवा में सांस ले रही हैं और हम जीवंत लोकतंत्र में रह रहे हैं। महात्मा गांधी की अहमियत सिर्फ भारत को राजनीतिक आजादी दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने आर्थिक, सामाजिक, जातिगत व धार्मिक सभी तरह का भेदभाव खत्म कर बेहतर भारत के निर्माण की राह भी दिखाई थी। आज गाँधी जी के विचार पूरे विश्व में सर्वग्राह्य हैं।

गाँधी जी सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, स्वराज्य व रचनात्मक कार्यक्रमों के कायल थे। इन सभी सिद्धान्तों को उन्होंने न सिर्फ वैचारिक धरातल पर उतारा बल्कि उनमें अन्तर्सम्बन्ध भी स्थापित किया। गाँधी जी को ‘महात्मा’ की उपाधि से सर्वप्रथम विभूषित करने वाले रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था कि- ‘‘गाँधी जी एक राजनीतिज्ञ, संगठनकर्ता, जनमानस के नेता और नैतिक सुधारक के रूप में महान हैं, परन्तु वह मनुष्य के रूप में उससे भी अधिक महान हैं। यद्यपि वह असाध्य रूप से आदर्शवादी थे और अपने निश्चित मापदण्डों द्वारा प्रत्येक कार्य को मापते थे, फिर भी वह मानव प्रेमी हैं न कि खोखले विचारों के प्रेमी।’’ गाँधी जी सत्य के बहुत बड़े प्रणेता थे और इसके लिये अहिंसा के तरीकों के पक्षपाती थे। सत्याग्रह उनके लिए मात्र नीति नहीं, सिद्धान्त था। वस्तुतः सत्याग्रह के माध्यम से गाँधीजी ने महात्मा बुद्ध, महावीर व तमाम महापुरूषों द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के सिद्धान्त को सामाजिक व राष्ट्रीय शक्ति में तब्दील कर दिया। पाश्चात्य विचारक थोरो की व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा की अवधारणा को सामाजिक शक्ति में बदलकर ऐसा बेमिसाल जनजागरण पैदा किया जो दीर्घकाल तक अवश्य चलता है, पर असफल नहीं होता। स्वयं गाँधी जी का मानना था कि- ‘‘सत्याग्रह एक ऐसा आध्यात्मिक सिद्धान्त है जो मानव मात्र के प्रेम पर आधारित है। इसमें विरोधियों के प्रति घृणा की भावना नहीं है।’’ अहिंसा गाँधी जी का प्रमुख सत्याग्रही हथियार था। गाँधी जी के लिये अहिंसा, हिंसा का निषेध मात्र नहीं थी बल्कि एक जीवन पद्धति थी। वे अक्सर कहा करते थे कि आज की दुनिया में जितने लोग जीवित हैं, वे बताते हैं कि दुनिया का आधार हथियार बल नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि दुनिया इतने हंगामों के बाद भी टिकी हुई है। गाँधी जी की अहिंसा कायरता का प्रतीक नहीं बल्कि अन्तश्चेतना व आत्मा में विश्वास करने वाली वीरता का परिचायक है। उन्होंने इसे व्याख्यायित करते हुये लिखा कि -‘‘यद्यपि अहिंसा का अर्थ क्रियात्मक रूप से जानबूझकर कष्ट उठाना है, तथापि यह सिद्धान्त दुराचारियों के सामने हथियार डालने का समर्थन नहीं करता। इसके विपरीत यह दुराचारी का पूर्ण आत्मबल से सामना करने की प्रेरणा देता है। इस सिद्धान्त को मानने वाला व्यक्ति अपनी इज्जत, धर्म और आत्मा की रक्षा के लिए एक अन्यायपूर्ण साम्राज्य सहित समस्त शक्तियों को भी चुनौती दे सकता है और अपने पराक्रम द्वारा उसके पतन के बीज भी बो सकता है।’’ बताते हैं कि जब इटली के तानाशाह मुसोलिनी के आग्रह पर गाँधी जी उससे मिलने गये, तो कईयों ने उन्हें समझाया कि एक अहिंसक व्यक्ति का हिंसक व्यक्ति से मिलना उचित नहीं। पर गाँधी जी ने जवाब दिया कि हिंसक व्यक्ति से हिंसा ज्यादा खतरनाक है और हमारा उद्देश्य सत्य व अहिंसा के माध्यम से अहिंसा को खत्म करना है। गाँधी जी तीन लोगों के साथ मुसोलिनी से मिलने गये, जब कि वहाँ कुर्सियाँ सिर्फ दो थीं। जब मुसोलिनी ने गाँधी जी से बैठने का आग्रह किया तो गाँधी जी ने अपने साथ आये तीनों लोगों को कुर्सी की तरफ इशारा करते हुये बैठने को कहा। मुसोलिनी का सोचना था कि कुर्सी पर सिर्फ गाँधी जी और वो बैठेगा, पर गाँधी जी अपने साथ के तीन अन्य मेहमानों की खातिर कुर्सी पर बैठने को राजी नहीं हुये और अन्ततः मुसोलिनी को तीन अन्य कुर्सियाँ मँगवानी पड़ी। वाकई यह रोचक घटनाक्रम दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह और एक अहिंसक सत्याग्रही के बीच घटा था, जिसने तानाशाह को एक सत्याग्रही की बात मानने पर मजबूर कर दिया।

गाँधी जी स्वदेशी के प्रबल समर्थक थे। वे जानते थे कि असली भारत गाँवों में बसता है, जिसके आर्थिक स्वावलम्बन की रीढ़ कुटीर व लघु उद्योगों पर टिकी हुयी है। गाँधी जी का चरखा कातना प्रतीकात्मक रूप में स्वदेशी व स्वावलम्बन का ही प्रतीक था। स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए ही वे विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान करते थे। गाँधी जी सिर्फ राजनैतिक व्यक्ति नहीं बल्कि एक रचनात्मक समाज सुधारक भी थे। अस्पृश्यता, नारी सुधार, हिन्दू-मुस्लिम एकता इत्यादि के लिए उन्होंने बहुत कार्य किये। अस्पृश्यता को मानवता पर कलंक बताते हुये उन्होंने इसके उन्मूलन पर जोर दिया व तद्नुसार अछूतों को सम्मानजनक ‘हरिजन’ नाम देने, हरिजन सेवक संघ की स्थापना, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अस्पृश्यता के विरुद्ध लिखना एवं देशव्यापी भ्रमणों के दौरान अछूतों की बस्तियों में जाकर उनको गले लगाकर अस्पृश्यता को अवैज्ञानिक व अमानवीय सिद्ध करने जैसे अप्रतिम कदम उठाये। गाँधी जी के मन में नारी के प्रति बड़ी श्रद्धा थी। वे नारी को पर्दा-प्रथा, बाल-विवाह व बहु-विवाह जैसी मान्यताओं से बाहर निकालना चाहते थे और उनके आह्वान पर न सिर्फ तमाम नारियों ने पर्दा-प्रथा से बाहर निकल कर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लिया बल्कि औरों को भी जागृत किया। नारी उत्थान हेतु गाँधी जी ने शिक्षा, अन्तर्जातीय विवाह व विधवा विवाह पर जोर दिया। उनका मानना था कि जब तक नारी अपने अधिकारों हेतु स्वयं आगे नहीं आयेगी, तब तक उसकी स्थित में परिवर्तन नहीं होगा।

गाँधी जी धर्म व सम्प्रदाय में भेद करते थे। धर्म उनके लिये कर्मकाण्डों से नहीं अपितु मानवीय व नैतिक गुणों से निर्मित था। वे राजनीति व धर्म के सहअस्तित्व को स्वीकार करते हुये दोनों के लिए सत्य, अहिंसा, त्याग, विश्वबन्धुत्व, आत्मविश्वास व नैतिकता को जरूरी मानते थे। साधन और साध्य दोनों की पवित्रता पर जोर देते हुये वे किसी भी प्रकार के छल कपट या अनुचित तरीकों को पसन्द नहीं करते थे। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति के विपरीत गाँधी जी हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। 1919 में खिलाफत आन्दोलन के दौरान उन्होंने इसे हिन्दुओं व मुसलमानों के मध्य एकता स्थापित करने का ऐसा सुअवसर बताया जो कि आगे सौ वर्षों तक नहीं मिलेगा। हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रति गाँधी जी का आग्रह इसी से समझा जा सकता है कि जब 15 अगस्त 1947 को सारा देश आजादी के जश्न में डूबा था तो गाँधी जी साम्प्रदायिक दंगों को खत्म करने के लिए नोआखली में पद यात्रा कर रहे थे। वस्तुतः गाँधी जी के लिए स्वतंत्रता का स्वरूप सिर्फ राजनैतिक नहीं था, अपितु यह लोगों की सामाजिक, आर्थिक व आत्मिक उन्नति भी थी, जिसे वे ‘राम-राज्य’ कहा करते थे।

आज गाँधी जी के विचार पूरे विश्व में सर्वग्राह्य हैं। बीबीसी द्वारा भारत की स्वतंत्रता के 60 वर्ष पूरे होने पर किये गये एक सर्वेक्षण के मुताबिक आज भी पाश्चात्य देशों में भारत की एक प्रमुख पहचान गाँधी जी हैं। यही नहीं तमाम पाश्चात्य देशों में गाँधीवाद पर विस्तृत अध्ययन हो रहे हैं, तो भारत में सुन्दरलाल बहुगुणा, अन्ना हजारे, मेघा पाटेकर, अरूणा राय से लेकर संदीप पाण्डे तक तमाम ऐसे समाजसेवियों की प्रतिष्ठा कायम है, जिन्होंने गाँधीवादी मूल्यों द्वारा सामाजिक आन्दोलन खड़ा करने की कोशिशें कीं। आँकड़े गवाह हैं कि विश्व भर में हर साल गाँधी जी व उनके विचारों पर आधारित लगभग दो हजार पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है एवम् हाल के वर्षां में गाँधी जी की कृतियों का अधिकार हासिल करने के लिये प्रकाशकों व लेखकों के आवेदनों की संख्या दो गुनी हो गई है। वस्तुतः आज जरूरत गाँधीवाद को समझने की है न कि उसे आदर्श मानकर पिटारे में बन्द कर देने की। स्वयं गाँधी जी का मानना था कि आदर्श एक ऐसी स्थिति है जिसे कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता बल्कि उसके लिए मात्र प्रयासरत रहा जा सकता है। कभी आर्नल्ड टॉयनबी ने कहा था - ‘‘मैं जिस पीढ़ी में पैदा हुआ, वह पीढ़ी पश्चिम में केवल हिटलर अथवा स्तालिन की ही पीढ़ी नहीं थी अपितु भारत में गाँधी जी की भी पीढ़ी थी। हम निश्चयपूर्वक यह भविष्यवाणी कर सकते हैं कि मानव इतिहास पर गाँधी जी का प्रभाव हिटलर और स्तालिन के प्रभाव से अधिक होगा।’’ आज की नयी पीढ़ी गाँधी जी को एक नए रूप में देखना चाहती है। वह उन्हें एक सन्त के रूप में नहीं वरन् व्यवहारिक आदर्शवादी के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

वस्तुतः सत्य, प्रेम व सहिष्णुता पर आधारित गाँधी जी के सत्याग्रह, अहिंसा व रचनात्मक कार्यक्रम के अचूक मार्गों पर चलकर ही विश्व में व्याप्त असमानता, शोषण, अन्याय, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, दुराचार, नक्सलवाद, पर्यावरण असन्तुलन व दिनों-ब-दिन बढ़ते सामाजिक अपराध को नियंत्रित किया जा सकता है। गाँधी जी द्वारा रचनात्मक कार्यक्रम के जरिए विकल्प का निर्माण आज पूर्वोत्तर भारत व जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों की समस्याओं, नक्सलवाद व घरेलू आतंकवाद से निपटने में जितने कारगार हो सकते हैं उतना बल-प्रयोग नहीं हो सकता। गाँधी जी दुनिया के एकमात्र लोकप्रिय व्यक्ति थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वयं को लेकर अभिनव प्रयोग किए और आज भी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, आर्थिक मुद्दों पर उनकी नैतिक सोच व धर्म-सम्प्रदाय पर उनके विचार प्रासंगिक हैं। तभी तो भारत के अन्तिम वायसराय लार्ड माउण्टबेन ने कहा था-‘‘गाँधी जी का जीवन खतरों से भरी इस दुनिया को हमेशा शान्ति और अहिंसा के माध्यम से अपना बचाव करने की राह दिखाता रहेगा।’’


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