Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



सन्नाटा


राजीव कुमार


सूर्य के प्रकाश में भी उसको अंधेरा-सा महसूस हो रहा था। पंखे के नजदीक रहने पर भी पसीना बहने का सिलसिला बदस्तूर जारी था। परिवार के सदस्यों के बीच भी उसके चेहरे पर सन्नाटा पसरा हुआ था। आज वो अपने पिता के सामने कैदी की तरह खड़ा था। उसके मन-मस्तिष्क में एक ही बात कुंडली मारकर बैठी थी कि पिताजी क्या कहेंगे। वो खुद को महासागर की अतल गहराइयों में डूबा महसूस कर रहा था, क्योंकि जब वो अच्छा कमा रहा था तो उसने अपने पिताजी को घर से निकाल दिया था और आज दाने-दाने को मोहताज था।

उसके पिता ने डांटकर कहा, ‘‘राहुल, तुम्हारे चेहरे पर सन्नाटा क्यों पसरा हुआ है? क्यी इसी दिन के लिए तुमको पाल-पोसकर बड़ा किया था कि अपनी मनमानी करते रहो? तुम्हारी तरह मैं नहीं कर सकता, आखिर मैं तुम्हारा बाप हूं। पहले कुछ खा-पी लो, मैं बाजार से आता हूं।’’ राहुल ने नजर उठाकर देखा तो महसूस हुआ कि पिताजी भी रो रहे हैं, लेकिन उसकी तरह आंसू नहीं बह रहे हैं। बाप ने बेटे को गले लगा लिया।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें