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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



अभी नहीं -----


पूर्णिमा शर्मा


आजकल मिली आईने के सामने कुछ ज्यादा वक़्त नज़र आती है। हर वक़्त गुनगुनाती और बेख्याली की दुनिया में रहती। पानी मांगो तो फोन ला देती है,फोन मांगो तो चश्मा। शारीरिक परिवर्तन के साथ उसका मन बहका-बहका सा रहता है हर पल।

सुबह रमा देर से उठी। गत रात, मिली को फोन पर किसी लड़के से बात करते सुना था। बातें भी आम बातों से हट कर थीं। मन चिंताओं से घिर गया था। उठते ही फिर समाधान खोजने बैठ गयी। डांटने से तो बेटी विद्रोही हो गलत कदम उठा सकती है।

आज रमा को पति की कमी बहुत खल रही थी। वो आज होते तो हम मिलकर कोई राह निकालते। अब घर और नौकरी के बीच क्‍या कम परेशानियाँ हैं, जो अब यह भी ? इस नाज़ुक मसले पर किसी से सलाह माँगना यानी उन्हें चटपटी चर्चा का मसाला देना।

मिली स्कूल से आयी तो रमा उसे नाश्ता देकर वहीं बैठ गयी। अपने फोन को निकालकर उसने ऑफिस के एक कर्मचारी का नम्बर मिलाया 'अररे राकेश जी। मैं आज कैश निकालना भूल गयी थी। मेरा डेबिट कार्ड भी वहीं रह गया। आप तो अभी वहीं हो न। मेरा घर आपके रास्ते में ही पड़ता है। प्लीज़ क्या आप आते वक्त एटीएम से मेरा कार्ड लेकर कुछ पैसे निकलवा कर मुझे दे देगें..? मेरे कार्ड का पिन नम्बर है.."

"अररे मम्मी रूको। यह क्या कर रही हो। किसी अंजान को यूँ अपनी जानकारी नही दिया करते।"

"अंजान कहाँ है..? मेरे ऑफिस में ही तो काम करता है।"

"हाँ तो..! अपनी निजी जानकारियाँ तो किसी को भी नही बतानी चाहिए।" मिली ने समझदारी भरे बोल रमा के सामने परोसे तो अपने फोन को नीचे रखा और चश्में को नाक तक सरकाते हुए कहा "और मेरी बेटी जो आधी रात को किसी अंजान व्यक्ति से अपनी व्यक्तिगत जानकारियाँ साझा करती है वो..!!"

मिली एक पल को सकपकायी मगर तुरंत सँभलते हुए बोली "माँ वह मेरा ब्वॉयफ्रेंड....सॉरी मेरा मतलब फ्रेंड है।"

"हाँ तो..! अपनी निजी जानकारियाँ तो किसी को भी नही बतानी चाहिए।" रमा ने मिली के कहे शब्द दोहराये।

सुनकर मिली कुछ गंभीर हो गयी। उसे चुप देख, रमा पुनः बोली, "बेटी यह दुनिया बहुत ज़ालिम और मक्कार है। तुम्हारी जिंदगी के फैसले तुम्हारे अपने होगें। मगर पहले तुम्हें आत्मनिर्भर बनना होगा।

मिली माँ की बात सुनकर दोनों हाथों की उँगलियाँ चटकाने लगी, तो रमा ने उसे टोका," मिली, बुरी बात।"

अपनी बेटी को तनाव की अवस्था में अक्सर वह इस तरह की हरकतें करते हुए देखती थी। ध्यान हटाने के लिए आगे कहा "अच्‍छा जा मेरे लिए अदरक वाली कड़क चाय तो बना दे, सर दर्द से फटा जा रहा है।"

रसोई में मिली फोन पर किसी को समझा रही थी,"देखो अगले महीने बोर्ड के इम्तेहान हैं उसके बाद कम्पीटिशन। अब बिना काम के फोन मत किया करना। मैं व्यस्त रहूँगी।"


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