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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



बच्चा


आकांक्षा यादव


”इन बच्चों को भी कौन समझाये? सारा सामान उलट-पुलट कर रख दिया है। उधर संपादक भी रट लगाए है कि इसी महीने उसे बाल कविताएं चाहिए ताकि अगले अंक में बाल-दिवस पर प्रकाशित कर सके। एक-एक लाइन लिखने में कितना दिमाग खपाना पड़ता है, पर लय है कि बनती ही नहीं।”

........अजी, सुन रही हो- ”एक कप चाय तो पिला दो।” अब कुछ मूड बन रहा है लिखने का- ”बच्चों पर लिखना कितना रोचक लगता है आखिर वे इतने भोले व मासूम होते हैं। जग की सारी खुशियाँ उनकी किलकारियों से जुड़ी होती है।”

इस बीच पत्नी मेज पर चाय रखकर जा चुकी थी। वह अपनी बाल-कविता की लय बनाने में मशगूल थे। तभी उनके छोटे पुत्र बाहर से खेलकर आए और आते ही पापा की गोद में लपक पड़े। इधर साहबजादे पापा की गोद में लपके और उधर सारी चाय उनकी बाल कविता पर गिरकर फैल गई।

अपनी बाल कविता के इस हश्र पर उन्होंने आव देखा न ताव और तड़....तड़......तड़ कर तीन-चार थप्पड़ बेटे के गाल पर जड़ दिए। पापा के इस व्यवहार पर बेटा जोर-जोर से रोने लगा।

अब वे पत्नी पर बड़बड़ा रहे थे- ”एक बच्चे को भी नहीं संभाल सकती। घर में बैठकर क्या पता कि एक कविता लिखने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है।”

सकपकायी हुई पत्नी कभी बच्चे का चेहरा देखती तो कभी पति महोदय की बाल कविता।


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