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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



तब और अब


विष्णु कुमार ‘दीपक’


  
काक अब
कोकिल की तरह
गजल गुनगुनाने लगे हैं,
अंधे भी आज
आंखवालों को राह दिखाने लगे हैं।
सत्ता में 
चोर, लुटेरे और
जुमलेबाज आने लगे हैं,
जनता को 
लच्छेदार भाषणों से
सब्जबाग दिखाने लगे हैं।
आज के 
उदीयमान सितारे 
अखबारों में छाने लगे हैं,
कल के 
देदीप्यमान सितारे 
हाशिये पर आने लगे हैं।
भाई-भाई 
संपत्ति के लिए 
आपस में खून बहाने लगे हैं,
हद हो गई बेशर्मी की 
कलयुगी पुत्र ही
अपनी मां का आंचल उघारने लगे हैं।

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