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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



हां मैं सिर्फ एक हाउसवाइफ ही तो हूँ


वर्षा वार्ष्णेय


 
हां मैं सिर्फ एक हाउसवाइफ ही तो हूँ 
समाज की नजरों में जिसका कोई वजूद नहीं ।

सपनों को आंखों में बसाए ,
ख़्वाबों को दिल में छिपाए 
कब बड़ी हो जाती है लड़की 
उम्र का पता ही नहीं लगता।

बांध दी जाती है एक खूंटे से ,
बिना उसकी मर्जी जाने 
विदा हो जाती है उम्र से पहले 
अपनी खुशियों का गला घोंटे ।

उम्मीदें होती हैं हजारों सबको 
चाहे बड़े हों या छोटे ,
ओढ़कर शर्म का गहना 
रहती है सपनों से आंख मींचे 

आ जाते हैं गोद में जब फूल 
भूल जाती है ख़्वाबों की abcd
बन जाता है मकसद सींचना ,
दुनिया को अपनी ख़्वाबों में समेटे ।

कहने को तो बेगार हूँ ,
सिर्फ आराम की तलबगार हूँ ।
उठता है दर्द पोर पोर में,
सहने है फिर भी तानों के कशीदे ।

चर्चे हैं आजकल बहुत मेरे ,
क्या गली घर और बगीचे ।
आराम ही आराम है जिंदगी में 
देखो वो हैं अब जिम्मेदारियों से छूटे ।

काश सीखा होता दुनिया से ,
गप्प मारकर जिंदगी जीना ।
न होते अरमान फना हमारे 
हम भी जी पाते झूठा मुखौटा लपेटे ।
	 

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