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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



जब प्रेम उपजता है


सुशील शर्मा


  
प्रेम जब उपजा है मन में ,
तुम्हारी यादें मुस्कुराती। 
स्मृति के पिंजड़े में जड़ी, 
सोंधी मुग्ध मिट्टी सी बसाती। 

साँझ के पंछी सा ये मन 
तकता है राह तुम्हारी। 
शायद तुम लौट आओ,
अनुप्राणित मैं आभारी। 

तुम्हारे  देह रंध्रों से बहता 
रूप से पगा प्रेम मेरा
सागर सा उत्प्लावित। 
सरंध्रित नेह तेरा। 

तुम्हारा यह स्पन्द
बांध देता है मुझे 
चिर-अखंड अपनापे से। 
ओस से गिरते अहसासों 
तनहा से तारों के पास 
 प्रतिबिंबित प्रतिमापों से । 

सुबह सकपकाई सी धूप 
लिखती है प्रेम की इबारत
देह  के छोर पर 
प्यार के रिश्तों की शरारत। 

झांकता है तेरे रूप का सूरज
प्यार की धमकी से सहमाता है मुझे। 
रात की तन्हाई में 
किरचों सा बिखराता है मुझे। 

देह के रिश्ते लिज़लिज़ाते ,
प्रेम से दूर बेहद दूर।  
रिश्तों के इशारे, 
होते कितने मजबूर। 

आत्मा के अंतिम किनारे
प्रणय के कुहरे घने हैं। 
मौन की  अभिव्यंजना में 
हम तुम गहरे सने हैं। 

एक सूरज जल उठा है
चांदनी चर्चित है क्यों ?
रोशनी क्यों बिक रही?
प्रेम अब वर्जित है क्यों ?

प्रेम की सतहों पर क्यों 
ढकी है यह देह तेरी। 
शब्द क्यों बुन रहें हैं 
कत्ल की साजिश यूँ मेरी। 


विरह की पीड़ा में ये  मन 
अनस वेदनाओं को समेटे।
कोटि कोटि लहरों में मंज कर 
यायावरी की चादर लपेटे ।


प्रेम जब उपजता है मन में
गूँथता सम्पूर्ण सृष्टि । 
आप्त करता है सभी को 
वेदना-सी प्रखर दृष्टि । 

प्रेम स्वयं को बर्खास्त करता है। 
ज़माने के दर्द की शिनाख्त करता है। 

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