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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



वृक्ष हूं मैं


आचार्य सुखदेव सिलोड़ी


                          
कल आज और कल हूं मैं

तेरी पीढ़ी, पूर्वज का साथी

देख तो फलवान हूं मैं

सींच ले हे मां मुझे

तेरी आश हूं, औलाद हूं मैं

वृक्ष हूं मैं।

पर्यावरण रक्षक हूं मैं

विषैले तत्व का भक्षक हूं मैं

तपन में छाया हूं मैं

ताप का नाशक हूं मैं

आन हूं, धरती की शान हूं मैं

वृक्ष हूं मैं।

भण्डार आयुर्वेद का मैं

ज्वर नाशक, जरा नाशक

फल मेरे हैं प्राण दायक

प्राण देता हूं मैं सबको

ओज हूं मैं, तेज हूं मैं

वृक्ष हूं मैं।

पर तेरे हाथों कट रहा हूं

सुन मेरा तू आर्तनाद

आवाक् हूं, नहीं निर्जीव मैं

हे अनुज! तेरा अग्रज हूं मैं

बच्चा हूं मैं सच्चा हूं मैं

वृक्ष हूं मैं।

जल से सिञ्चन कर मेरा

प्रिय आत्मज मैं तेरा

दस पुत्र सम हूं एक ही मैं

मत कटाओ ओह! मुझे

तेरा पुत्र हूं मैं, पौत्र हूं मैं

वृक्ष हूं मैं।

सोये हुए हे मनुज! जाग

दे नया जीवन मुझे

कर मेरा रोपण हे मानुष!

दिखा दे अपना आज पौरुष

जीवन हूं मैं, जल स्रोत हूं मैं

वृक्ष हूं मैं।

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