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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



हम जिंदा कब थे?


श्रीयांश गुप्ता


                          
हम जिंदा कब थे?
अगर हम  जिंदा होते तो,
किसी औरत का बलात्कार नही सहते,
किसी व्यक्ति की निंदा नही करते,
भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाते,
न कि उसमें भागीदार बनतें।
अगर हम  जिंदा होते तो,
डॉनेशन लेकर विध्या का अपमान नहीं करते,
लडकियों को कोख में नहीं मारते,
दहेज जैसा पाप नही करते।
अगर हम  जिंदा होते तो,
किसी नारी को कम नहीं समझते,
अपने ऊपर घमंड नहीं करते,
दूसरो की सहायता करते।
अगर हम  जिंदा होते तो,
भेदभाव नहीं करते,
माँ-बाप को वृद्धाश्रम नहीं भेजते,
अंधविश्वास नहीं फैलते।
इसीलिए तो मैं कहता हूँ
हम जिंदा कब थे?

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