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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



सनातन संघर्ष


समितिंजय शुक्ल


                          
अंधेरा था 
या एक ही विचार का विस्तार 
या अनाधिकृत फैलाव एक चित्र का
था रूका हुआ जल रचनात्मकता 
नीचे निवासता था दैत्य अहि 
सूर्य चंद्र का पूर्ण ग्रहण था
थी हवा भी जैसे रूकी हुई
लपेटे सर्प काया में सृष्टि 
था बढ़ता जा रहा समय को बांध अहि 


यत्न स्वतंत्रता का किया 
कइयों ने कई बार 
पर विफल हुए 
किए अपने ही अस्त्रों आत्मघात 
आंखों से ओझल वो बढ़ता गया 
ना दिन होता ना रात 
बन गया था अपना अंतिम सत्य वही
असत! 
था जिसमें कोई अस्तित्व नहीं 
तब जन्म लिया 
एक युवा वीर ने 
अपने समस्त्र इंद्रियों में साँस भरी 
जल- जीवन की धार फोड़ने 
अपनों को नया संसार दिलाने 
अस्त्र पे अपने धार धरी 
अनदेखा कर देखते हुए 
कि है किसी को उससे ना कुछ पडी़ 
सोम- रस डकार 
कर हुंकार 
अहि के द्वार पर जा चोट किया 
युद्ध घमासान हुआ 
सर्प अहि ने वीर को जकड़-जाम किया 
वीर अहं से बाहर निकल 
अहि की कमर से तलवार खींच 
उसको टुकड़ों में बांट दिया 
समरस नदियों का जल प्रपात किया 
सूर्य चंद्र आकाश में टांग 
समय चक्र घुमा 
सत को असत से निकाल दिया 
देवों ने उसे देवेंद्र उपाधि
वेदों ने उसे प्रथम स्थान दिया।। 

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