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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



प्रतिशोध का फलसफा


रश्मि सुमन


                          
शब्दों की वेदी पर प्रणय की दास्तान ही नहीं,
प्रतिशोध का फलसफा भी लिखा जाता

मन मे घुमड़ते विचारों के कोलाहल का प्रतिशोध है खामोशी
तो आत्मा का नये शरीर मे प्रवेश करना आग से प्रतिकार

दिलों में बढ़ती दूरियाँ प्रतीक है
अपनेपन के दिखावे का बोनसाई 
और सपने....जैसे किसी पहर में जमी हो नींद की काई सी

गाहे बगाहे बुखार का होना,
जैसे संवेदनाओं का मन से त्यक्त होना
और अंतस का प्रतिशोध है नाखूनों का बढ़ना

सुरसा की तरह बढ़ती एक तरफ जनसंख्या का भार झेलती धरा का विरोध करता ज्वालामुखी
तो दूसरी तरफ गुरुत्व बल के खिलाफ़ विद्रोह है पेड़ों का ऊपर की तरफ बढ़ना

इस प्रतिकार भरे प्रणय के दौर में धड़कती हैं स्पंदनविहीन धड़कनें
जो आमादा है बदलने को खुशियों के मायने

चुप्पी के इस घने दौर में खामोशी से अपना प्रतिकार दर्ज करा रहे सभी
मानो शापग्रस्त शिला सा हो गया हो प्रतिकार का प्रणय

जो समय व परिस्थिति के साथ घटे या बढ़े,
आकर्षित करे या फिर विकर्षित
वह प्रेम नहीं होता

बल्कि वह प्रतिकार का प्रणय होता है,
विद्रोह की प्रीति होती है.....

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