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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



गुफ्तगू


लवनीत मिश्रा


   
याद  है तुझको मुलाकात पहली,
जब आँखों से तेरी टकराई आंखे,
शर्म से झुका ली नज़रे तूने अपनी,
पलट कर जब भी,मेरी नज़र तुझको ताके,
नजदीक से मेरे आकर गुजरना,
नाम ना दे इसको इत्तेफ़ाक़ का,
की कागज के टुकड़े जो तूने थे गिराए,
देते है गवाही उसी बात का,
कागज के टुकड़ो को जब मैंने उठाया,
देखा  तो दिल धड़कने लगा था,
लिखा था तूने प्यार से नाम अपना,
पता देख कर दिल हसने लगा था,
की तुझको भी चाहत है मिलने की हमसे,
मुलाकात का इसको समझू इशारा,
खामोश होकर जो गुफ्तगू की आज हमने,
खोगया दिल यह मेरा बनकर बेचारा,
याद  है तुझको मुलाकात पहली,
जब आँखों से तेरी टकराई आंखे,
शर्म से झुका ली नज़रे तूने अपनी,
पलट कर जब भी,मेरी नज़र तुझको ताके
 

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