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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



मुहब्बत हो न पायेगी


डॉ डी एम मिश्र


  
हमें गुमराह करके क्या पता वो कब निकल जाये
बड़ा वो आदमी है क्या पता ठिकाना कब बदल जाये

ज़रूरी हो जहाँ दूरी बना करके रहा करिये
किसी मासूम को कब छिपकली गप से निगल जाये

दग़ा देकर गया जो वो तो पहले से पराया था
पता चलता नही कब आँख का काजल निकल जाये

इसे दीवानगी कहते उसे बस रोशनी दिखती 
मगर ये कौन बतलाये कि परवाना सँभल जाये

बहुत सोचोगे तो तुमसे मुहब्बत हो न पायेगी
वो दिल ही क्या न जो उसकी अदाओं पर मचल जाये

उसे मौका मिले तो वो जु़बाँ भी काट ले मेरी
यही वो चाहता है बस ज़ुबाँ मेरी फिसल जाये

ख़ु़दा या तो  यही कर दे किनारे पर लगे कश्ती 
खु़दा या फिर यही कर दे कि साहिल ही बदल जाये
 

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