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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



आग किसको कहाँ लगाना था


बृजेश पाण्डेय बृजकिशोर ‘विभात’


  
आग किसको कहाँ लगाना था।
सिर्फ  चिनगारियाँ  उड़ाना  था।

जिन  रगों  में  बसी  हुई  थी मैं,
वो  रकीबी  भरा  दिवाना  था।

जो कहा था  कभी  मुझे  प्यारी,
लिख दिया कि तुझे जलाना था।

राह   तकता   जरूर  था   मेरी,
नामुरादी   बड़ा     सयाना   था।

जो  बहारें   सज़ा   रखा    मेरी,
आज  जाना  मुझे  चिढ़ाना था।

राह  तकना   घड़ी   घड़ी  मेरी,
ज़ालिम  कितना   ज़माना  था।

सामने  जो   ‘विभात'  था   मेरे,
नामुराद  उसका   फ़साना   था।
 

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