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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



वो निभाना भूल जाता है


अनिल "मानव"


 
वफ़ा की आस देकर वो निभाना भूल जाता है।
बुरा हो वक़्त तो यारों ज़माना भूल जाता है।

उलझकर आदमी घर की ज़रूरत में ही रातों-दिन,
मुहब्बत ज़िन्दगी में ही जताना भूल जाता है।।

करूँ मैं क्या, किसी के ग़म को सुनकर यार अक़्सर ही,
मेरा दिल अपने दर्दों को सुनाना भूल जाता है।।

पिलाकर चाय वो अक़्सर मुझे टरका ही देता है 
कभी भी साथ में चीज़ें खिलाना भूल जाता है।।

अमीरों को जहां सारा ये हरदम  याद रखता है
ग़रीबों को मग़र यारों ज़माना भूल जाता है।।

अजब फ़ितरत है साहब इस ज़माने की कहें तो क्या
बड़ा होकर बशर रिस्ता निभाना भूल जाता है।।
	 
 

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