Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



क्या ग़ज़ब की बात है


अनिल "मानव"


 
उनके घर कुत्तों का पहरा क्या ग़ज़ब की बात है।
हर घड़ी वो बदलें चेहरा क्या ग़ज़ब की बात है।।

मौज़-मस्ती भी करेंगे ज़ाम भी टकराएगी,
ले रहे है रोज लहरा क्या ग़ज़ब की बात है।।

देख संसद में जा बैठा, आता-जाता कुछ नही,
लूला लंगड़ा या हो बहरा क्या ग़ज़ब की बात है।।

चल तुझे दिखलाएँ कैसे झूमती है मुफ़लिसी,
गम को करके ख़ाक ठहरा क्या ग़ज़ब की बात है।।

खुद उगाये खा न पाये रात-दिन खेती करे,
पेट के चक्कर में उलझा क्या ग़ज़ब की बात है।।

साँप-सीढ़ी का सियासत खेल है समझ लो तुम,
जिसको जो पाया है काटा क्या ग़ज़ब की बात है।।

तुम कभी महसूस करना बात 'मानव' काम की,
काटता है रिस्ता गहरा क्या ग़ज़ब की बात है।।

	 
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें