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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



जय गणेश देवा
( सरसी छन्द )


महेन्द्र देवांगन माटी


   
गौरी पूत गणपति विराजो , मंगल कीजै काज ।
रिद्धी सिद्धि के स्वामी हो तुम,  रख लो मेरी लाज ।।1।।

पहली पूजा करते हैं सब , करें आरती गान ।
गीत भजन मिलकर गाते हैं, आँख मूंदकर ध्यान ।।2।।

लड्डू मोदक भाते तुमको, मूषक करे सवार ।
माथे तिलक लगाते भगवन , और गले में हार ।।3।।

ज्ञान बुद्धि के देने वाले,  सबके तारण हार ।
आया हूँ मैं शरण आपके,  कर दो बेड़ा पार ।।4।।
 

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