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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



जो जैसा है,वैसा ही स्वीकार करें


लेखक: श्री वीनेश अंताणी
अनुवादक: डॉ.रजनीकान्त एस.शाह


तीस वर्षीय हीना पाँच वर्ष के वैवाहिक जीवन के बाद विचित्र कही जाए ऐसी व्यग्रता में आ गई है। उसे उसके पति को लेकर कोई शिकायत नहीं है,फिरभी उससे चीड़चिड़ी रहती है। वह जानती है,कि कारण तुच्छ है। हीना कहती है, `योगेश को सबकुछ आराम से करने की आदत है। आराम से उठना,धीरे धीरे नित्यकर्म से फारिग होना, नाश्ता करने या भोजन करने में ज्यादा वक्त लेना जैसी उनकी आदतें हैं। हमें कभी बाहर जाना हो,तो हमेशा सबसे बाद में घर से निकलते है। ठीक उससे उल्टा मेरा स्वभाव सारे काम तेजी से करने का है। मेरा वर्तन हमेशा देर हो गई है,ऐसा रहता है। मैं योगेश की कच्छप गति से त्रस्त हो जाती हूँ। उन्हें टोकती रहती हूँ,कि ``योगेश! आप अपनी आदत क्यों नहीं बदल रहे?’’ मैंने उन्हें बदलने की हजार कोशिशें की हैं,पर उन्होंने कभी भी मुझे अपना हडबडिया स्वभाव बदलने के लिए कभी नहीं कहा। उन्होंने मैं जैसी हूँ,वैसी मुझे अपना लिया है। जबकि मैं उसे जैसा है,वैसा अपना नहीं सकती।

यह समस्या मात्र हीना की ही नहीं थी। हम सब कमोबेश अन्य व्यक्ति को वह जैसा है,वैसा अपना नहीं पाते हैं। वह तो अलमारी खुला ही छोड़ेगा,कपड़े तितर-बितर कर देगा,उसके खाने-पीने की आदतें ठीक नहीं हैं।–ऐसी शिकायत हम हमारे निकट के व्यक्ति के लिए करते रहते हैं। खास निसबत न हो ऐसे ओफिस के सहकर्मी,पड़ोसी,ड्रायवर,दुकानदार,क्रिकेट के खिलाड़ी,पथचारी-सभी प्रकार के लोगों का व्यवहार ठीक नहीं है,ऐसी मान्यता बनाकर जीने की आदत हो जाती है। यह एक प्रकार से `I am o.k.,you are not o.k.’ जैसा अभिगम है।

सीधी सादी बात तो यह है,कि हर व्यक्ति अन्य व्यक्ति से अलग है। जैसे हमारी पद्धति है,हमारे अभिगम हैं,हमारी आदतें हैं,उसी प्रकार अन्य व्यक्ति में भी उसकी पद्धति,अभिगम और आदतें हो सकती हैं। लोगों में हम अपना प्रतिबिंब ही देखना चाहते हैं। यह गलत है। संभव है,कि अन्य व्यक्तियों को भी उनके दृष्टिकोण के अनुसार हमारे कईं बर्ताव पसंद न हों। क्या हम अन्य के दृष्टिकोण के अनुरूप ढलने के लिए तैयार हैं?

अनजान या अल्प परिचित व्यक्ति के बारे में भी हम अपनी मान्यता के अनुसार अनुमान करते हैं। इस संदर्भ में अमरिकी गायिका डेमी लोवोटा का चीख जैसा विधान याद रखने जैसा है: ``आप मेरे लिए कोई पूर्वधारणा मत बनाओ,आप मेरा नाम ही जानते हैं,मुझे अंदर से जानते नहीं हैं।’’आमतौर पर, हरएक व्यक्ति अन्य लोगों को ऊपर ऊपर से देखकर उनके बारे में मनपसंद प्रभाव बना लेने में माहिर होता है। वह अन्य व्यक्ति के लिए स्वीकृत अनुमान में सत्य के लिए कोई अवकाश छोडते नहीं हैं। इस पृथ्वी पर रहनेवाले सभी व्यक्तियों का पिंड भिन्न रूप से बना हुआ होता है। उसमें उसकी परवरिश,उसे प्राप्त वातावरण,उसकी परिस्थितियाँ तथा उसकी पारिवारिक-सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका अलग होती हैं। अन्य को नापने के लिए हमारे मापदंड उपयोगी नहीं होते।

अपने ही दृष्टिकोण और पद्धतियों के अनुसार, अन्य व्यक्ति की खामियाँ खोजते हुए लोग अनजाने ही अन्याय कर बैठते हैं। उनको लोगों की मर्यादाएँ नजर आती हैं,वे उनकी विशिष्टताओं के प्रति ध्यानाकर्षित करना चूक जाते हैं। अन्य लोगों को टीकात्मक दृष्टि से देखने का अभिगम रखकर हम खुद को दु:ख पहुँचाते हैं। परिवार जनों के प्रति भी असंतोष का भाव बना रहता है। इस वजह से हम उन्हें अपने साथ जुडने नहीं देते और न ही हम उनसे जुड़ पाते हैं। परस्पर विशृंखलता का भाव मन में बना रहता है। परिवार के सदस्य के साथ जुड़ नहीं पानेवाला व्यक्ति बृहदजगत में अकेला पड जाता है। उसके मन में असंतोष और फरियाद का भाव हमेशा के लिए बैठ जाता है।

कोई व्यक्ति हमारी मान्यता से अलग करता हो,तब हमें अपने भीतर से बाहर निकलकर उस व्यक्ति में प्रवेश करने का प्रयत्न करना चाहिए। वह अपनी समस्या का समाधान हमारी पद्धति से नहीं खोजेगा उसका व्यवहार हमें नुकसान पहुंचता नहीं हो तब तक उस व्यक्ति में बदलाव आना ही चाहिए,ऐसा मानने के लिए कोई वजह नहीं है। दलाईलामा ने बड़ी अच्छी बात कही है,``लोग सुख और संतोष पाने के लिए हम से अलग मार्ग चुने तो उसका मतलब यह नहीं है,कि वे गलत राह पर चढ़ गये हैं।’’


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