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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 73, नवंबर(द्वितीय), 2019

चीख

रश्मि सुमन

घुटी घुटी सी चीखें गले मे दबी रह गयी थी उसकी, इतनी ज़ोर से माँ ने मुँह दबाये रखा था उसका.....

" खटाई खाने का मन करता है माँ ", बस इतना ही कहा था उसने। शशशशशश......चुप्प.... एकदम चुप कर ( इशारे से माँ ने कहा)

पैर पटकने लगी (बनावटी गुस्से में) ज़िद करने लगी वो मासूम खटाई खाने को.... फिर मचलते हुए उसने कहा , क्यों! इमरतिया भी (उस मासूम की सहेली) तो खाये है, उसकी अम्मा तो न मना करे है", फिर तू काहे नहीं खाने दे रही...? एकदम्मे से बहस करने लगी है छोरी तू तो (रोटी सेंकते हुए माँ ने कहा), फिर खीझते हुए गुस्से से बोली, " तेरे बापू को जब पता चल जावेगा कि तू पेट से है तो तेरे साथ साथ हमरी भी जान ले लेंगे ".... पर माँ! बापू ही तो कहत रहे कि "ई मिट्ठी मिट्ठी गोली खा ले, तेरी माँ नहीं जान पायेगी कि कि हमने तेरे साथ क्या किया है".....माँ ने झट से कहा कि " तेरे बापू ने".......???

चूल्हे के सामने दीवार पर पोस्टर लगी थी " बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ ".....


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