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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



भाड़


मिर्ज़ा हफ़ीज़


भड़भुंजा उदास था । उदास क्या ? शायद वह डिप्रेशन मे था । वह भाड़ झौंकते हुये बड़बड़ाये जारहा था- “ज़िन्दगी गुज़र गयी भाड़ झोंकते । क्या पाया ? दुनिया देखो कहां से कहां पहुंच गयी ।“ उसके सर से निकलती पसीने की धार उसके चेहरे से होते हुये , उसकी भाड़ की रेत मे गिर रही थी जिसमे वह चने भून रहा था । भाड़ की गर्मी से उसका चेहरा और हाथ झुलसकर काले पड़ चुके थे । मैने कहा- “चचा , भाड़ गरम हो तो ज़रा चने भून दो । गरमा गरम फ़ुटाने ( फ़ूटे हुये चने ) चाहिये ।“ “मियां , तुम तो बस चने ही भुना लो । और तो कुछ सूझता नहीं ।“ उसने बड़ी तल्खी से कहा । “और क्या भुना लूं चचा ?” मैने पूछा । “देशभक्ति । मियां , देशभक्ति ही आज कल हॉट है । देखो देशभक्ति भुना कर लोग कहां से कहां पहुंच गये … पद्मभूषण … पद्मविभूषण … हासिल कर लिया । और तुम बस चने भुनाते रह गये । जाओ जाओ देशभक्ति भुनाओ । फ़ुटाने खाकर कौन सा तीर मार लोगे ।“ “लेकिन चचा ! किस भाड़ मे जाऊं , कहां कहां भुनाऊं ।“ “राजनीति मे जाओ । मीडिया मे जाओ । बड़े बड़े भड़भुंजे बैठे हैं वहां । आज की डेट मे यही सबसे बड़ी भाड़ है…” तभी उनका बेटा बाहर निकल आया । वह गबरू नौजवान बड़े तल्ख लहज़े मे बोला- “और आपको बड़ी जल्दी अक्ल आगयी ज़िन्दगी भर बस भाड़ झोंकते रहे…” चचा का पसीना बहकर भाड़ की रेत मे गिरने लगा , जिसमे वे चने भून रहे थे ।
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