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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



रावण दहन


राजेश श्रीवास्तव


दो पैर , दो भुजाएँ / चौड़ी छाती, मजबूत कंधे - बिशालकाय शरीर बनाई / उस पर दस शीश लगाई / पुतला निस्तेज पड़ा था / फिर उसे सहारा दिया - खड़ा किया / फिर भी पुतला चुप था / हाथों में हथियार थमाएँ / आँखों में नफ़रत का रंग भरा / पुतले में कोई हलचल ना हुई / फिर भी मन ना भरा / हाथ , पैर , पेट, पीठ , एक-एक अंग में बारूद भरा / पुतला डरा, सहमा / बारूद के जहर से कराहा / लेकिन कुछ ना किया ना कहा / फिर उस बारूद में आग लगा दी गई / पुतला धूं- धूं करके जलने लगा / अपने को बचाने के लिए / छटपटाने लगा / जलते बारूद बिखरने लगे / लोगों पर गिरने लगे / लोग जलने लगे / गिरने -पड़ने लगे / भागने चिल्लाने लगे / एक दूसरे को कुचलने लगे / अगले दिन लोगों ने कहा / रावण, सचमुच बड़ा शैतान था / पुतले की आत्मा ने अट्टाहास किया / रावण बड़ा शैतान था ? बनाया इसको - वो क्या इंसान था ?
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