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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



जूता


राजेन्द्र वर्मा


जूता, फ़कत जूता नहीं है, हमारे पाँव का मालिक है ये। पहनते हम नहीं इसको, पहनता है हमीं को ये बनाने को हमें यह ख़ास! ये जूते की भी इच्छा है, उसे पहने कोई पी.एम्., कोई सेक्रेटरी, डी.एम्. कोई एम्.पी., मिनिस्टर, कोई एस्.पी., कमिशनर, कोई साहब, कोई नायब.... उसे तक़लीफ होती है पहनता है उसे जब- कोई मुंशी, गार्ड, चपरासी, कोई ग्वाला, कोई माली, कोई दर्जी, कोई धोबी, कोई नाई-मिरासी... फड़ी ऐडि़याँ देख भी वह मुँह बनाता है, बिना मोजे के पैरों से हमेशा ख़ार खाता है। ये जूता है जो तय करता रहा रेखा ग़रीबी की- इधर, सहमा-सा चमरौधा, उधर, अकड़े हुए ‘वुडलैंड, ‘मोची, ऐक्शन, बाटा!’ नरम रहने को इक को चाहिए ज़रा-सा तेल कड़ुआ, मगर हाँ, दूसरे को चाहिए वह क्रीम औ’ पॉलिश जो बनती है उन्हीं के ख़ूं-पसीने से, मयस्सर है न आसानी से जिनको एक चमरौधा। फटा जैसे ही इक जूता, बदल दोनों ही जाते हैं। ये चप्पल हैं- रगड़कर जो हमेशा पहनी’ जाती हैं। विवश हो टूट जब जातीं, सिली जाती हैं तब तक, जब तलक दोनों सिरों से घिस नहीं जातीं! कभी बेटे ने पहना बाप का जूता, बुरा जूते ने कब माना? मगर नौकर ने ग़लती से भी अपना पाँव जो डाला, वो उसके सिर पे चढ़ बैठा, उसे औक़ात बतला दी, उसे धरती सुंघा दी। कभी मंदिर या’ मस्जिद में अगर जाना पड़े हमको, तो’ जूते की तबीयत एकदम गिरने ही लगती है, सताता है उसे डर: वह किसी के पाँव से रौंदा नहीं जाए, कहीं चोरी न हो जाये, कि अपनों से बिछुड़कर भीड़ में खोकर न रह जाये! मगर सबसे बड़ा डर है उसे- कहीं ऐसा न हो जाये कि कोई शख़्स अपना पाँव ही उसमें न दे डाले कि जिसकी हैसियत ही दो बख़त की रोटियों की है, कि जिसकी हैसियत ही बस, रबर के चप्पलों की है!
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