Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



विकास की पहचान


प्रताप सिंह


गुजर चुका है तूफ़ान थम चुकी है तबाही और काले पड़ चुके हैं अपनों, परायों के रक्त के धब्बे, किन्तु मौत सा स्याह सन्नाटा बिखरा पड़ा है चारो ओर. अपनी आँखों में "ज्ञान के प्रकाश" के सपने पालती इक्कीसवीं सदी के भारत की एक लड़की, जिसके लिए सुरक्षित नहीं है घर से स्कूल तक का सफ़र भी, सहमी हुई, अपने घर में, स्टडी-टेबल पर बैठी है उसकी काँपती उँगलियाँ और अविश्वासपूर्ण दृष्टि पाठ्य-पुस्तक की उन पंक्तियों पर टिकी है जहाँ लिखा है- "ईश्वर एक है और हम सब उसकी संतान हैं" , जहाँ लिखा है- "स्त्री का विकास ही समाज के विकास की पहचान है".
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें