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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



प्रेम-प्रस्ताव


प्रताप सिंह


जैसा भी हूँ प्यार कर लेना। चाँद-तारे तो तोड़ कर नहीं ला सकूँगा। हाँ मेरे छोटे बड़े प्रयासों के फलस्वरूप तुम्हारे होठों पर उभर आई निर्मल, चमकीली मुस्कान जब मेरी आँखों में ख़ुशी के सैकड़ों सितारे छींट देगी और चेहरे पर चाँदनी उड़ेल देगी उसे ही अपनी आँखों और हथेलियों में भर लेना। वादा नहीं करता कि तुम्हारे उर-व्योम पर कभी पीड़ा के मेघ नहीं छाने दूँगा और आँखों से एक बूँद भी जलन नहीं टपकने दूँगा। हाँ मेरे हिय-धरा पर कभी भी उपेक्षा का कोई आवरण नहीं होगा, मुझमें अपना हर ताप उड़ेलकर स्वयं को खाली कर लेना। नहीं जानता कि मैं तुममें कितना उतर सकूँगा तुम्हें कितना भर सकूँगा। हाँ तुम्हारे रिक्त क्षेत्र पर कभी कोई दावा नहीं करूँगा कभी अपने अधिकार में नहीं लूँगा, उसे तुम स्वेच्छया अपनी अभिरुचि से भर लेना।
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