Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



एक जगह जहाँ कुछ भी ना हो


प्रद्युम्न आर चौरे


एक जगह जहाँ कुछ भी ना हो।। एक ऐसा इलाका। यहाँ सचमुच में हो।। जहाँ ख्वाबों का मेरे। कोई कातिल ना हो।। मैं सबकुछ करूँ। और कुछ हासिल ना हो।। जिस जगह की हवाओं में। बस सन्नाटों का शोर हो।। मूक जहाँ की हर निशा। और चुपचाप सी भोर हो।। मैं बैठूं,बिठालूँ खुद को जहाँ। मैं निखरुं,निखारूँ खुद को जहाँ।। ना होके भी कुछ,जहाँ सबकुछ सा हो। एक ऐसा इलाका यहाँ सचमुच में हो।। कुछ पाने की ज़िद जहाँ होगी नहीं। कुछ खोने का डर ना सताए जहाँ।। उस जगह का गर मार्ग मिले। मैं जाऊं वहाँ,छोड़ सारा जहां।। जहाँ सफ़र तो होगा। पर मंज़िल नहीं।। और मंज़िल नहीं। तो कोई मुश्किल नहीं।। मैं लूटूँ नज़ारे, सब भुला दूँ जहाँ। आकाँक्षाओं को सुला दूँ जहाँ।। ना होके भी कुछ,जहाँ सबकुछ सा हो। एक ऐसा इलाका यहाँ सचमुच में हो।। बन जाऊं कुछ पल आवारा जहाँ। मनमौजी मैं और मेरा मन हो जहाँ।। काश! करिश्मा हर रोज़ हो। मैं अकेला रहूँ और संग फ़ौज हो।। हकीकत से सजी वो निराली जगह।। मैं चाहूँगा जाना वहाँ बेवजह।। कर बैठा हूँ में सलाखों से प्यार। चौखट तक सिमित मेरे अनहद विचार।। जहाँ हल्ला करूँ में,जहाँ टल्ला सकूँ में। हदों से परे मैं जाऊं जहाँ।। ना होके भी कुछ,जहाँ सबकुछ सा हो। एक ऐसा इलाका यहाँ सचमुच में हो।।
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें