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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



एक कविता ऐसी भी

अशोक बाबू


पंखों पर बैठाये शहद उड़ रही मधुमक्खी शायद वह भूली है अपना ही घर । चारों तरफ सन्नाटा कानों में रुई लगाए लोग बैठे हैं जैसे महातम मना रहे डरे डरे सकपकाए । धूल उडना बंद कर हवा जरा थम जा चोर बैठा पाट पर बना रहा योजना । सड़क पर लुढ़कता लौटा किसी भिखारी का शायद वह भी परेशान है गरीबी की बीमारी से ।
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