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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



अंगुलियों को मुट्ठी में तब्दील करने की जरुरत

अमरेंद्र सुमन


कितनी हिफाजत से बचपन की दक्ष हाथों को उसके बूढ़े होने की असमर्थता तक ताजा व तंदुरुस्त बनाए रखती हैं काली चमड़ी के अन्दर की साफ-सुथरी सोंच वाली आदिवासी युवतियाँ झिकटी की रगड़ से देह की मैल को दुधिया करने की कला से अनभिज्ञ काली चमड़ी के अन्दर की साफ-सुथरी सोंच वाली युवतियाॅं जानती हैं गेरुए दिवारों के कलेवर पर उकेरना वन्दना, करमा के गीतों की थिरकन के बीच अपने भविष्य की कम महत्वाकांक्षी तस्वीरें गंभीरता की सींक से वे सिलतीं हैं पलास के पत्तों को अपने दो माहिर हाथों से अपने जन्म की पुरानी आदतों से लाचार संतुष्टि की धरातल पर काम करने जमाने से प्राप्त फरेब व इल्जामों के अवसादों को लगातार काम करके भी न सुस्ताने की क्षमता वाली मानसिकता लिये वे सहती चली आ रही हैं संयमता के न अनुमानित कठोर नियम गहरी सोंच में डूबे अपनी परम्परा के एकाकीपन को मिटाने डनकी हाथों को हरवक्त मालूम है बिरादरी के लोगों के बीच उनके उत्सव की किफायती हंड़िया(पोचई)बाँटने की असाधारण सी तरकीबें स्वार्थ के बीमार अड़गड़े में कैद एकलव्य बिरादरी की ये सन्तानें दिन-प्रतिदिन बनती जा रहीं समाज के ठेकेदारों द्वारा उनके भरण-पोषण की स्थायी नुमाइषें नौः छः के चाणक्य रहस्यों से महफूज बिगड़े दिमाग की अल्पकालिक विकसित दुनिया की मंडियों में आज धड़ल्ले से जारी है इनकी खरीद-बिक्री इनके शरीर के वजन से भी कम गिनती के रुपयों में एलोरा व अजंता की गुफाओं के भित्ति चित्रों की आँखों से दुनिया देखने को विवश इन्हें खुद सुलझानी होगीं अपनी विस्तृत समस्याओं की अनसुलझी गुत्थी जब तक इनमें अपने जीने की थोड़ी भी ललक ,आकांक्षा बची हो
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