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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



किश्तों में किया प्यार जैसे कोई जुगाड़

अमिताभ विक्रम


किश्तों में किया प्यार जैसे कोई जुगाड़, टुकड़ों में जोड़ा वो वफ़ा का कबाड़। ज़ंग लगी कसमों से नहाया हुआ फ़रेब, तेरा बनाया हुआ वो राई का पहाड़। चापलूसी की चाशनी से चिपका हुआ मुंह, मानो पड़ गयी हो एक तगड़ी लताड़। वो साँस तेरा छोड़ना फिर चूमते मुझे, मानो आ गयी हो तर्जनी बीच किवाड़। एक दिन फिर बोलना अब प्यार ना रहा, क्या था वो प्यार या कोई खिलवाड़।
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