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वर्ष: 1, अंक 5, नवम्बर, 2016



अब गदहे भी घोड़े कहलाने लगे है


राजेश श्रीवास्तव


इस कदर अब बुरे वक्त आने लगे हैं / सोएं मुर्गे, लोग उनको जगाने लगे हैं/ कश्ती डूबने की डर थी जिन्हे बीच भँवर में / अपनी कश्ती ही खुद वो डुबोने लगे है / ना दुःख में शामिल, सुख में मिलना बामुश्किल / अब "फेसबुक" पर केवल दोस्ती निभाने लगे है / जवानी के जोश में हुए बेख़ौफ़ इस कदर / मासूमों पर ही अपनी मर्दांगिनी दिखाने लगे है / जिन्हे मालूम नहीं तख़्त क्या बला है "राजन" अब वे ही केवल तख़्त पाने लगे है / कैसे-कैसे हालात पैदा हुए इस वतन में / अब गदहे भी घोड़े कहलाने लगे है / किनके भरोसे छोडू अपने प्यारे वतन को/ लूट में "काले" ही "गोरों" को हराने लगे है /
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